अर॑ण्या॒न्यर॑ण्यान्य॒सौ या प्रेव॒ नश्य॑सि ।
क॒था ग्रामं॒ न पृ॑च्छसि॒ न त्वा॒ भीरि॑व विन्दती३ँ
araṇyānyaraṇyānyasau yā preva naśyasi |
kathā grāmaṃ na pṛcchasi na tvā bhīriva vindatī3m̐
ऋषि: ऐरम्मदो देवमुनिः · देवता: अरण्यानी · छन्द: अनुष्टुप्
6 श्लोक · 146 में से 191
ऐरम्मद देवमुनि अनुष्टुप् छन्द में वन की देवी अरण्यानी का गान करते हैं। हे अरण्यानी, तुम जो दूर खोती-सी लगती हो, गाँव का पता क्यों नहीं पूछतीं? क्या तुम्हें भय नहीं लगता? साँझ को लगता है गायें चर रही हैं, कोई घर दिखता है, कोई गाड़ी चरमराती है। कोई गाय को पुकारता है, कोई लकड़ी काटता है; रात रुकने वाला सोचता है किसी ने चीख मारी। फिर भी अरण्यानी मारती नहीं, जब तक कोई और आक्रमण न करे; मनुष्य मीठे फल खाकर इच्छा से विश्राम करता है। ऋषि अंजन-सुगन्धित, बिना खेती के अन्न से भरी, मृगों की माता अरण्यानी की स्तुति करते हैं।
अर॑ण्या॒न्यर॑ण्यान्य॒सौ या प्रेव॒ नश्य॑सि ।
क॒था ग्रामं॒ न पृ॑च्छसि॒ न त्वा॒ भीरि॑व विन्दती३ँ
araṇyānyaraṇyānyasau yā preva naśyasi |
kathā grāmaṃ na pṛcchasi na tvā bhīriva vindatī3m̐
वृ॒षा॒र॒वाय॒ वद॑ते॒ यदु॒पाव॑ति चिच्चि॒कः ।
आ॒घा॒टिभि॑रिव धा॒वय॑न्नरण्या॒निर्म॑हीयते
vṛṣāravāya vadate yadupāvati ciccikaḥ |
āghāṭibhiriva dhāvayannaraṇyānirmahīyate
उ॒त गाव॑ इवादन्त्यु॒त वेश्मे॑व दृश्यते ।
उ॒तो अ॑रण्या॒निः सा॒यं श॑क॒टीरि॑व सर्जति
uta gāva ivādantyuta veśmeva dṛśyate |
uto araṇyāniḥ sāyaṃ śakaṭīriva sarjati
गाम॒ङ्गैष आ ह्व॑यति॒ दार्व॒ङ्गैषो अपा॑वधीत् ।
वस॑न्नरण्या॒न्यां सा॒यमक्रु॑क्ष॒दिति॑ मन्यते
gāmaṅgaiṣa ā hvayati dārvaṅgaiṣo apāvadhīt |
vasannaraṇyānyāṃ sāyamakrukṣaditi manyate
न वा अ॑रण्या॒निर्ह॑न्त्य॒न्यश्चेन्नाभि॒गच्छ॑ति ।
स्वा॒दोः फल॑स्य ज॒ग्ध्वाय॑ यथा॒कामं॒ नि प॑द्यते
na vā araṇyānirhantyanyaścennābhigacchati |
svādoḥ phalasya jagdhvāya yathākāmaṃ ni padyate
आञ्ज॑नगन्धिं सुर॒भिं ब॑ह्व॒न्नामकृ॑षीवलाम् ।
प्राहं मृ॒गाणां॑ मा॒तर॑मरण्या॒निम॑शंसिषम्
āñjanagandhiṃ surabhiṃ bahvannāmakṛṣīvalām |
prāhaṃ mṛgāṇāṃ mātaramaraṇyānimaśaṃsiṣam
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