इस अध्याय में क्या होता है वृत्रहन्ता इन्द्र में श्रद्धा सुवेदा शैरीषि जगती और त्रिष्टुप् में इन्द्र की स्तुति करते हैं। हे इन्द्र, मैं तुम्हारे उस पहले क्रोध में श्रद्धा रखता हूँ जब तुमने वृत्र को मारा और मनुष्यों के लिए जल खोले; दोनों लोक तुम्हारे पीछे चलते हैं और तुम्हारे बल से पृथ्वी भी काँपती है। हे निर्दोष, तुमने अपनी शक्तियों से मायावी वृत्र को कुचला; मनुष्य गायों की खोज में और हर पुकार में तुम्हें ही चुनते हैं। ऋषि इन्द्र से कहते हैं कि इन यजमानों में प्रसन्न हों जिन्होंने उनका दान पाया। मित्र और वरुण की तरह तुम बाँटते हो, जैसे अन्न बाँटा जाता है।
147.1 श्रत्ते॑ दधामि प्रथ॒माय॑ म॒न्यवेऽह॒न्यद्वृ॒त्रं नर्यं॑ वि॒वेर॒पः । उ॒भे यत्त्वा॒ भव॑तो॒ रोद॑सी॒ अनु॒ रेज॑ते॒ शुष्मा॑त्पृथि॒वी चि॑दद्रिवः
śratte dadhāmi prathamāya manyave'hanyadvṛtraṃ naryaṃ viverapaḥ | ubhe yattvā bhavato rodasī anu rejate śuṣmātpṛthivī cidadrivaḥ
147.2 त्वं मा॒याभि॑रनवद्य मा॒यिनं॑ श्रवस्य॒ता मन॑सा वृ॒त्रम॑र्दयः । त्वामिन्नरो॑ वृणते॒ गवि॑ष्टिषु॒ त्वां विश्वा॑सु॒ हव्या॒स्विष्टि॑षु
tvaṃ māyābhiranavadya māyinaṃ śravasyatā manasā vṛtramardayaḥ | tvāminnaro vṛṇate gaviṣṭiṣu tvāṃ viśvāsu havyāsviṣṭiṣu
147.3 ऐषु॑ चाकन्धि पुरुहूत सू॒रिषु॑ वृ॒धासो॒ ये म॑घवन्नान॒शुर्म॒घम् । अर्च॑न्ति तो॒के तन॑ये॒ परि॑ष्टिषु मे॒धसा॑ता वा॒जिन॒मह्र॑ये॒ धने॑
aiṣu cākandhi puruhūta sūriṣu vṛdhāso ye maghavannānaśurmagham | arcanti toke tanaye pariṣṭiṣu medhasātā vājinamahraye dhane
147.4 स इन्नु रा॒यः सुभृ॑तस्य चाकन॒न्मदं॒ यो अ॑स्य॒ रंह्यं॒ चिके॑तति । त्वावृ॑धो मघवन्दा॒श्व॑ध्वरो म॒क्षू स वाजं॑ भरते॒ धना॒ नृभि॑ः
sa innu rāyaḥ subhṛtasya cākananmadaṃ yo asya raṃhyaṃ ciketati | tvāvṛdho maghavandāśvadhvaro makṣū sa vājaṃ bharate dhanā nṛbhiḥ
147.5 त्वं शर्धा॑य महि॒ना गृ॑णा॒न उ॒रु कृ॑धि मघवञ्छ॒ग्धि रा॒यः । त्वं नो॑ मि॒त्रो वरु॑णो॒ न मा॒यी पि॒त्वो न द॑स्म दयसे विभ॒क्ता
tvaṃ śardhāya mahinā gṛṇāna uru kṛdhi maghavañchagdhi rāyaḥ | tvaṃ no mitro varuṇo na māyī pitvo na dasma dayase vibhaktā
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