दशम मण्डल

सूक्त 131: सुत्रामा इन्द्र, सरस्वती द्वारा उपचार

ऋषि: सुकीर्तिः काक्षीवतः · देवता: इन्द्रः, ४-५ अश्विनौ · छन्द: त्रिष्टुप्, ४ अनुष्टुप्

7 श्लोक · 131 में से 191

इस अध्याय में क्या होता है

सुत्रामा इन्द्र, सरस्वती द्वारा उपचार

सुकीर्ति काक्षीवत त्रिष्टुप् में इन्द्र की स्तुति करते हैं; दो मन्त्र अश्विनों को हैं। इन्द्र से विनती है कि पूर्व, पश्चिम, उत्तर और दक्षिण के सब शत्रुओं को भगाए, ताकि हम उसकी विस्तृत शरण में आनंद करें। जैसे जौ उगाने वाले क्रम से जौ काटते हैं, वैसे वह नमनपूर्वक बर्हि लाने वालों को अन्न दे। शोभा के स्वामी अश्विनों ने असुर नमुचि के पास सुराम पिया और इन्द्र के कर्मों में सहायता की; माता-पिता जैसे पुत्र की, वैसे उन्होंने उसकी रक्षा की, और सरस्वती ने मघवा का उपचार किया। सूक्त सुत्रामा, अर्थात अच्छे रक्षक इन्द्र के साथ समाप्त होता है: वह कृपालु हो, द्वेष दूर करे और अभय दे।

131.1

अप॒ प्राच॑ इन्द्र॒ विश्वाँ॑ अ॒मित्रा॒नपापा॑चो अभिभूते नुदस्व ।
अपोदी॑चो॒ अप॑ शूराध॒राच॑ उ॒रौ यथा॒ तव॒ शर्म॒न्मदे॑म

apa prāca indra viśvām̐ amitrānapāpāco abhibhūte nudasva |
apodīco apa śūrādharāca urau yathā tava śarmanmadema

131.2

कु॒विद॒ङ्ग यव॑मन्तो॒ यवं॑ चि॒द्यथा॒ दान्त्य॑नुपू॒र्वं वि॒यूय॑ ।
इ॒हेहै॑षां कृणुहि॒ भोज॑नानि॒ ये ब॒र्हिषो॒ नमो॑वृक्तिं॒ न ज॒ग्मुः

kuvidaṅga yavamanto yavaṃ cidyathā dāntyanupūrvaṃ viyūya |
ihehaiṣāṃ kṛṇuhi bhojanāni ye barhiṣo namovṛktiṃ na jagmuḥ

131.3

न॒हि स्थूर्यृ॑तु॒था या॒तमस्ति॒ नोत श्रवो॑ विविदे संग॒मेषु॑ ।
ग॒व्यन्त॒ इन्द्रं॑ स॒ख्याय॒ विप्रा॑ अश्वा॒यन्तो॒ वृष॑णं वा॒जय॑न्तः

nahi sthūryṛtuthā yātamasti nota śravo vivide saṃgameṣu |
gavyanta indraṃ sakhyāya viprā aśvāyanto vṛṣaṇaṃ vājayantaḥ

131.4

यु॒वं सु॒राम॑मश्विना॒ नमु॑चावासु॒रे सचा॑ ।
वि॒पि॒पा॒ना शु॑भस्पती॒ इन्द्रं॒ कर्म॑स्वावतम्

yuvaṃ surāmamaśvinā namucāvāsure sacā |
vipipānā śubhaspatī indraṃ karmasvāvatam

131.5

पु॒त्रमि॑व पि॒तरा॑व॒श्विनो॒भेन्द्रा॒वथु॒ः काव्यै॑र्दं॒सना॑भिः ।
यत्सु॒रामं॒ व्यपि॑ब॒ः शची॑भि॒ः सर॑स्वती त्वा मघवन्नभिष्णक्

putramiva pitarāvaśvinobhendrāvathuḥ kāvyairdaṃsanābhiḥ |
yatsurāmaṃ vyapibaḥ śacībhiḥ sarasvatī tvā maghavannabhiṣṇak

131.6

इन्द्र॑ः सु॒त्रामा॒ स्ववाँ॒ अवो॑भिः सुमृळी॒को भ॑वतु वि॒श्ववे॑दाः ।
बाध॑तां॒ द्वेषो॒ अभ॑यं कृणोतु सु॒वीर्य॑स्य॒ पत॑यः स्याम

indraḥ sutrāmā svavām̐ avobhiḥ sumṛḻīko bhavatu viśvavedāḥ |
bādhatāṃ dveṣo abhayaṃ kṛṇotu suvīryasya patayaḥ syāma

131.7

तस्य॑ व॒यं सु॑म॒तौ य॒ज्ञिय॒स्यापि॑ भ॒द्रे सौ॑मन॒से स्या॑म ।
स सु॒त्रामा॒ स्ववाँ॒ इन्द्रो॑ अ॒स्मे आ॒राच्चि॒द्द्वेष॑ः सनु॒तर्यु॑योतु

tasya vayaṃ sumatau yajñiyasyāpi bhadre saumanase syāma |
sa sutrāmā svavām̐ indro asme ārācciddveṣaḥ sanutaryuyotu

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