आ त्वा॑ वहन्तु॒ हर॑यो॒ वृष॑णं॒ सोम॑पीतये ।
इन्द्र॑ त्वा॒ सूर॑चक्षसः
ā tvā vahantu harayo vṛṣaṇaṃ somapītaye |
indra tvā sūracakṣasaḥ
ऋषि: मेधातिथिः काण्वः · देवता: इन्द्रः · छन्द: गायत्री
9 श्लोक · 16 में से 191
सूर्य जैसी आँखों वाले हरि अश्व वृषभ इन्द्र को सोमपान के लिए लायें। मेधातिथि काण्व गायत्री में उन्हें प्रातःसवन और चलते यज्ञ में बुलाते हैं। यहाँ घी में भीगे भुने धान हैं; हरि अश्व इन्द्र को सबसे सुखद रथ में लायें। हमारे सवन पर आओ और ऐसे पियो जैसे प्यासा गौर मृग पानी पीता है। यह स्तुति सबसे पहली है, जो तुम्हारे हृदय को छुए; निचोड़ा हुआ सोम पियो। वृत्र का संहार करने वाले इन्द्र आनन्द के लिए प्रत्येक सवन पर जाते हैं। अन्त में शतक्रतु से गौओं और अश्वों से हमारी कामना पूरी करने की प्रार्थना है।
आ त्वा॑ वहन्तु॒ हर॑यो॒ वृष॑णं॒ सोम॑पीतये ।
इन्द्र॑ त्वा॒ सूर॑चक्षसः
ā tvā vahantu harayo vṛṣaṇaṃ somapītaye |
indra tvā sūracakṣasaḥ
इ॒मा धा॒ना घृ॑त॒स्नुवो॒ हरी॑ इ॒होप॑ वक्षतः ।
इन्द्रं॑ सु॒खत॑मे॒ रथे॑
imā dhānā ghṛtasnuvo harī ihopa vakṣataḥ |
indraṃ sukhatame rathe
इन्द्रं॑ प्रा॒तर्ह॑वामह॒ इन्द्रं॑ प्रय॒त्य॑ध्व॒रे ।
इन्द्रं॒ सोम॑स्य पी॒तये॑
indraṃ prātarhavāmaha indraṃ prayatyadhvare |
indraṃ somasya pītaye
उप॑ नः सु॒तमा ग॑हि॒ हरि॑भिरिन्द्र के॒शिभि॑ः ।
सु॒ते हि त्वा॒ हवा॑महे
upa naḥ sutamā gahi haribhirindra keśibhiḥ |
sute hi tvā havāmahe
सेमं न॒ः स्तोम॒मा ग॒ह्युपे॒दं सव॑नं सु॒तम् ।
गौ॒रो न तृ॑षि॒तः पि॑ब
semaṃ naḥ stomamā gahyupedaṃ savanaṃ sutam |
gauro na tṛṣitaḥ piba
इ॒मे सोमा॑स॒ इन्द॑वः सु॒तासो॒ अधि॑ ब॒र्हिषि॑ ।
ताँ इ॑न्द्र॒ सह॑से पिब
ime somāsa indavaḥ sutāso adhi barhiṣi |
tām̐ indra sahase piba
अ॒यं ते॒ स्तोमो॑ अग्रि॒यो हृ॑दि॒स्पृग॑स्तु॒ शंत॑मः ।
अथा॒ सोमं॑ सु॒तं पि॑ब
ayaṃ te stomo agriyo hṛdispṛgastu śaṃtamaḥ |
athā somaṃ sutaṃ piba
विश्व॒मित्सव॑नं सु॒तमिन्द्रो॒ मदा॑य गच्छति ।
वृ॒त्र॒हा सोम॑पीतये
viśvamitsavanaṃ sutamindro madāya gacchati |
vṛtrahā somapītaye
सेमं न॒ः काम॒मा पृ॑ण॒ गोभि॒रश्वै॑ः शतक्रतो ।
स्तवा॑म त्वा स्वा॒ध्य॑ः
semaṃ naḥ kāmamā pṛṇa gobhiraśvaiḥ śatakrato |
stavāma tvā svādhyaḥ
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