प्रथम मण्डल

सूक्त 153: मित्रावरुण को घृत और नमस्कार

ऋषि: दीर्घतमा औचथ्यः · देवता: मित्रावरुणौ · छन्द: त्रिष्टुप्

4 श्लोक · 153 में से 191

इस अध्याय में क्या होता है

मित्रावरुण को घृत और नमस्कार

दीर्घतमा का यह छोटा त्रिष्टुप् सूक्त मित्र और वरुण को हवि अर्पित करता है। ऋत्विज एक साथ हवि, नमस्कार और घृत की धाराओं से इन महान देवों का यजन करते हैं, जैसे अध्वर्यु स्तुतियों से सेवा करते हैं। होता यज्ञसभा में उनका अभिषेक करता है। हवि देने वाले मनुष्य के लिए अदिति रूपी धेनु दूध से भर जाती है, जल और गौएँ पुष्ट होती हैं। ऋषि प्रार्थना करते हैं कि दोनों देव लाल गौ का दूध पिएँ और प्रसन्न हों।

153.1

यजा॑महे वां म॒हः स॒जोषा॑ ह॒व्येभि॑र्मित्रावरुणा॒ नमो॑भिः ।
घृ॒तैर्घृ॑तस्नू॒ अध॒ यद्वा॑म॒स्मे अ॑ध्व॒र्यवो॒ न धी॒तिभि॒र्भर॑न्ति

yajāmahe vāṃ mahaḥ sajoṣā havyebhirmitrāvaruṇā namobhiḥ |
ghṛtairghṛtasnū adha yadvāmasme adhvaryavo na dhītibhirbharanti

153.2

प्रस्तु॑तिर्वां॒ धाम॒ न प्रयु॑क्ति॒रया॑मि मित्रावरुणा सुवृ॒क्तिः ।
अ॒नक्ति॒ यद्वां॑ वि॒दथे॑षु॒ होता॑ सु॒म्नं वां॑ सू॒रिर्वृ॑षणा॒विय॑क्षन्

prastutirvāṃ dhāma na prayuktirayāmi mitrāvaruṇā suvṛktiḥ |
anakti yadvāṃ vidatheṣu hotā sumnaṃ vāṃ sūrirvṛṣaṇāviyakṣan

153.3

पी॒पाय॑ धे॒नुरदि॑तिरृ॒ताय॒ जना॑य मित्रावरुणा हवि॒र्दे ।
हि॒नोति॒ यद्वां॑ वि॒दथे॑ सप॒र्यन्स रा॒तह॑व्यो॒ मानु॑षो॒ न होता॑

pīpāya dhenuraditirṛtāya janāya mitrāvaruṇā havirde |
hinoti yadvāṃ vidathe saparyansa rātahavyo mānuṣo na hotā

153.4

उ॒त वां॑ वि॒क्षु मद्या॒स्वन्धो॒ गाव॒ आप॑श्च पीपयन्त दे॒वीः ।
उ॒तो नो॑ अ॒स्य पू॒र्व्यः पति॒र्दन्वी॒तं पा॒तं पय॑स उ॒स्रिया॑याः

uta vāṃ vikṣu madyāsvandho gāva āpaśca pīpayanta devīḥ |
uto no asya pūrvyaḥ patirdanvītaṃ pātaṃ payasa usriyāyāḥ

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