प्रथम मण्डल

सूक्त 154: विष्णु के तीन पग और परम पद

ऋषि: दीर्घतमा औचथ्यः · देवता: विष्णुः · छन्द: त्रिष्टुप्

6 श्लोक · 154 में से 191

इस अध्याय में क्या होता है

विष्णु के तीन पग और परम पद

दीर्घतमा त्रिष्टुप् छन्द में भगवान विष्णु के पराक्रम का गान करते हैं, जिन्होंने पृथ्वी के लोकों को नापा और ऊपर के धाम को थामा, तीन पगों में विस्तार से चलते हुए। वे पर्वतों पर विचरने वाले सिंह के समान भयंकर हैं, और सारे भुवन उनके तीन पगों में बसते हैं। उनके तीनों पद मधु से भरे हैं और कभी क्षीण नहीं होते। वे अकेले पृथ्वी, द्युलोक और सब प्राणियों को धारण करते हैं। ऋषि उस प्रिय धाम को पाना चाहते हैं जहाँ देवभक्त आनन्द करते हैं, क्योंकि विष्णु के परम पद में मधु का स्रोत है। उरुक्रम का यही सूक्त वामन कथा और वैष्णव परम पद का आधार है।

154.1

विष्णो॒र्नु कं॑ वी॒र्या॑णि॒ प्र वो॑चं॒ यः पार्थि॑वानि विम॒मे रजां॑सि ।
यो अस्क॑भाय॒दुत्त॑रं स॒धस्थं॑ विचक्रमा॒णस्त्रे॒धोरु॑गा॒यः

viṣṇornu kaṃ vīryāṇi pra vocaṃ yaḥ pārthivāni vimame rajāṃsi |
yo askabhāyaduttaraṃ sadhasthaṃ vicakramāṇastredhorugāyaḥ

154.2

प्र तद्विष्णु॑ः स्तवते वी॒र्ये॑ण मृ॒गो न भी॒मः कु॑च॒रो गि॑रि॒ष्ठाः ।
यस्यो॒रुषु॑ त्रि॒षु वि॒क्रम॑णेष्वधिक्षि॒यन्ति॒ भुव॑नानि॒ विश्वा॑

pra tadviṣṇuḥ stavate vīryeṇa mṛgo na bhīmaḥ kucaro giriṣṭhāḥ |
yasyoruṣu triṣu vikramaṇeṣvadhikṣiyanti bhuvanāni viśvā

154.3

प्र विष्ण॑वे शू॒षमे॑तु॒ मन्म॑ गिरि॒क्षित॑ उरुगा॒याय॒ वृष्णे॑ ।
य इ॒दं दी॒र्घं प्रय॑तं स॒धस्थ॒मेको॑ विम॒मे त्रि॒भिरित्प॒देभि॑ः

pra viṣṇave śūṣametu manma girikṣita urugāyāya vṛṣṇe |
ya idaṃ dīrghaṃ prayataṃ sadhasthameko vimame tribhiritpadebhiḥ

154.4

यस्य॒ त्री पू॒र्णा मधु॑ना प॒दान्यक्षी॑यमाणा स्व॒धया॒ मद॑न्ति ।
य उ॑ त्रि॒धातु॑ पृथि॒वीमु॒त द्यामेको॑ दा॒धार॒ भुव॑नानि॒ विश्वा॑

yasya trī pūrṇā madhunā padānyakṣīyamāṇā svadhayā madanti |
ya u tridhātu pṛthivīmuta dyāmeko dādhāra bhuvanāni viśvā

154.5

तद॑स्य प्रि॒यम॒भि पाथो॑ अश्यां॒ नरो॒ यत्र॑ देव॒यवो॒ मद॑न्ति ।
उ॒रु॒क्र॒मस्य॒ स हि बन्धु॑रि॒त्था विष्णो॑ः प॒दे प॑र॒मे मध्व॒ उत्स॑ः

tadasya priyamabhi pātho aśyāṃ naro yatra devayavo madanti |
urukramasya sa hi bandhuritthā viṣṇoḥ pade parame madhva utsaḥ

154.6

ता वां॒ वास्तू॑न्युश्मसि॒ गम॑ध्यै॒ यत्र॒ गावो॒ भूरि॑शृङ्गा अ॒यास॑ः ।
अत्राह॒ तदु॑रुगा॒यस्य॒ वृष्ण॑ः पर॒मं प॒दमव॑ भाति॒ भूरि॑

tā vāṃ vāstūnyuśmasi gamadhyai yatra gāvo bhūriśṛṅgā ayāsaḥ |
atrāha tadurugāyasya vṛṣṇaḥ paramaṃ padamava bhāti bhūri

पाठ का स्रोत: Wikisource · CC BY-SA 4.0 (Wikisource transcription of a public-domain text)