उत्तरकाण्ड

अध्याय 98: कलि के लक्षण: झूठे पण्डित और झूठे तपस्वी

6 श्लोक · 98 में से 130

इस अध्याय में क्या होता है

कलि के लक्षण: झूठे पण्डित और झूठे तपस्वी

काकभुशुण्डि गरुड़ को अपने पहले जन्म के कलियुग का वर्णन सुनाते हैं। वर्णधर्म और चारों आश्रम नहीं रहे, लोग श्रुति के विरोध में रत थे। ब्राह्मण वेद बेचते, राजा प्रजा को खाते, और शास्त्र की आज्ञा कोई न मानता। जिसे जो भाए वही मार्ग, जो गाल बजाए वही पण्डित, जो दम्भ करे वही सन्त। पराया धन हरने वाला सयाना, दम्भी बड़ा आचारी, झूठा और मसखरा गुणवान कहलाता। वेदमार्ग छोड़ने वाला ज्ञानी और विरागी माना जाता; बड़े नख और जटा वाला प्रसिद्ध तपस्वी। अमंगल वेष धरने वाले, भक्ष्य-अभक्ष्य सब खाने वाले ही योगी, सिद्ध और पूज्य थे।

98.1

बरन धर्म नहिँ आश्रम चारी । श्रुति बिरोध रत सब नर नारी ॥
द्विज श्रुति बेचक भूप प्रजासन । कोउ नहिं मान निगम अनुसासन ॥

barana dharma nahim̐ āśrama cārī | śruti birodha rata saba nara nārī ||
dvija śruti becaka bhūpa prajāsana | kou nahiṃ māna nigama anusāsana ||

98.2

मारग सोइ जा कहुँ जोइ भावा । पंडित सोइ जो गाल बजावा ॥
मिथ्यारम्भ दम्भ रत जोई । ता कहुँ, सन्त कहइ सब कोई ॥

māraga soi jā kahum̐ joi bhāvā | paṃḍita soi jo gāla bajāvā ||
mithyārambha dambha rata joī | tā kahum̐, santa kahai saba koī ||

98.3

सोइ सयान जो परधन हारी । जो कर दम्भ सो बड़ आचारी ॥
जो कह झूँठ मसखरी जाना । कलिजुग सोइ गुनवन्त बखाना ॥

soi sayāna jo paradhana hārī | jo kara dambha so bar̤a ācārī ||
jo kaha jhūm̐ṭha masakharī jānā | kalijuga soi gunavanta bakhānā ||

98.4

निराचार जो श्रुति पथ त्यागी । कलिजुग सोइ ज्ञानी सो बिरागी ॥
जा के नख अरु जटा बिसाला । सोइ तापस प्रसिद्ध कलिकाला ॥

nirācāra jo śruti patha tyāgī | kalijuga soi jñānī so birāgī ||
jā ke nakha aru jaṭā bisālā | soi tāpasa prasiddha kalikālā ||

दो॰ 98 (क)दोहा

असुभ बेष भूषन धरें, भच्छाभच्छ जे खाहिँ ।
तेइ जोगी तेइ सिद्ध नर, पूज्य ते कलिजुग माहिँ ॥

asubha beṣa bhūṣana dhareṃ, bhacchābhaccha je khāhim̐ |
tei jogī tei siddha nara, pūjya te kalijuga māhim̐ ||

98.सो॰ 98 (ख)सोरठा

जे अपकारी चार, तिन्ह कर गौरव मान्य तेइ ।
मन क्रम बचन लबार, तेइ बकता कलिकाल मह ॥

je apakārī cāra, tinha kara gaurava mānya tei |
mana krama bacana labāra, tei bakatā kalikāla maha ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0