उत्तरकाण्ड

अध्याय 97: पिछले कलियुग में अयोध्या में जन्म

6 श्लोक · 97 में से 130

इस अध्याय में क्या होता है

पिछले कलियुग में अयोध्या में जन्म

काकभुशुण्डि गरुड़ को वह पहला जन्म बताते हैं। पिछले कलियुग में वे कोसलपुर में शूद्र-शरीर पाकर जन्मे। शिव के सेवक थे, पर अभिमान से दूसरे देवताओं की निन्दा करते थे; धन के मद में मतवाले, बड़बोले और दम्भी होकर वे रघुपति की राजधानी में रहते हुए भी उसकी महिमा न जान सके। अब समझे हैं जो वेद और पुराण गाते हैं: किसी भी जन्म में अवध में बसने वाला राम-परायण होता है, पर उसका प्रभाव तभी जाना जाता है जब धनुषधारी राम हृदय में बसें। वह युग कठिन था। कलि के मल ने धर्म ग्रस लिया, सद्ग्रन्थ लुप्त हुए, दम्भियों ने मनमाने पन्थ चलाए और लोभ ने शुभ कर्म खा लिए।

97.1

तेहि कलिजुग कोसलपुर जाई । जन्मत भयउँ सूद्र तनु पाई ॥
सिव सेवक धन क्रम अरु बानी । आन देव निन्दक अभिमानी ॥

tehi kalijuga kosalapura jāī | janmata bhayaum̐ sūdra tanu pāī ||
siva sevaka dhana krama aru bānī | āna deva nindaka abhimānī ||

97.2

धन मद मत्त परम वाचाला । उग्रबुद्धि उर दम्भ बिसाला ॥
जदपि रहेउँ रघुपति रजधानी । तदपि न कछु महिमा तब जानी ॥

dhana mada matta parama vācālā | ugrabuddhi ura dambha bisālā ||
jadapi raheum̐ raghupati rajadhānī | tadapi na kachu mahimā taba jānī ||

97.3

अब जाना मैं अवध प्रभावा । निगमागम पुरान अस गावा ॥
कवनेहुँ जनम अवध बस जोई । राम परायन सो परि होई ॥

aba jānā maiṃ avadha prabhāvā | nigamāgama purāna asa gāvā ||
kavanehum̐ janama avadha basa joī | rāma parāyana so pari hoī ||

97.4

अवध प्रभाव जान तब प्रानी । जब उर बसहिँ राम धनु पानी ॥
सो कलिकाल कठिन उरगारी । पाप परायन सब नर नारी ॥

avadha prabhāva jāna taba prānī | jaba ura basahim̐ rāma dhanu pānī ||
so kalikāla kaṭhina uragārī | pāpa parāyana saba nara nārī ||

दो॰ 97 (क)दोहा

कलिमल ग्रसे धर्म सब, लुप्त भए सदग्रन्थ ।
दंभिन्ह निज अति कल्पि करि, प्रगट किये बहु पन्थ ॥

kalimala grase dharma saba, lupta bhae sadagrantha |
daṃbhinha nija ati kalpi kari, pragaṭa kiye bahu pantha ||

दो॰ 97 (ख)दोहा

भये लोग सब मोहबस, लोभ ग्रसे सुभ कर्म ।
सुनु हरिजान ग्यान निधि, कहउँ कछुक कलि-धर्म ॥

bhaye loga saba mohabasa, lobha grase subha karma |
sunu harijāna gyāna nidhi, kahaum̐ kachuka kali-dharma ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0