उत्तरकाण्ड

अध्याय 93: गरुड़ का मोह मिटा, फिर नया प्रश्न

6 श्लोक · 93 में से 130

इस अध्याय में क्या होता है

गरुड़ का मोह मिटा, फिर नया प्रश्न

भुशुण्डि के वचन सुनकर गरुड़ हर्ष से पंख फुला लेते हैं, आँखें भर आती हैं और रघुपति का प्रताप हृदय में बस जाता है। वे पछताते हैं कि अनादि ब्रह्म को मनुष्य मान बैठे थे, और काग के चरणों में बार-बार सिर नवाते हैं, उन्हें राम के समान जानकर प्रेम बढ़ाते हैं। वे कहते हैं, गुरु बिना कोई भवसागर नहीं तरता, चाहे वह ब्रह्मा या शंकर के समान हो। संशय-सर्प ने उन्हें डसा था और कुतर्क की लहरें उठ रही थीं; रघुनायक के भेजे गारुड़ी बनकर भुशुण्डि ने उन्हें जिला दिया। फिर प्रशंसा कर, सिर नवाकर, हाथ जोड़कर गरुड़ विनम्र वाणी में उत्तर माँगते हैं, जैसे दास स्वामी से।

93.1

सुनि भुसुंडि के बचन सुहाये । हरषित खगपति पङ्ख फुलाये ॥
नयन नीर मन अति हरषाना । श्रीरघुपति प्रताप उर आना ॥

suni bhusuṃḍi ke bacana suhāye | haraṣita khagapati paṅkha phulāye ||
nayana nīra mana ati haraṣānā | śrīraghupati pratāpa ura ānā ||

93.2

पाछिल मोह समुझि पछिताना । ब्रह्म अनादि मनुज करि माना ॥
पुनि पुनि काम चरन सिर नावा । जानि राम सम प्रेम बढ़ावा ॥

pāchila moha samujhi pachitānā | brahma anādi manuja kari mānā ||
puni puni kāma carana sira nāvā | jāni rāma sama prema bar̤hāvā ||

93.3

गुरु बिनु भव निधि तरइ न कोई । जौं बिरञ्चि सङ्कर सम होई ॥
संसय सर्प ग्रसेउ मोहि ताता । दुखद लहरि कुतर्क बहु ब्राता ॥

guru binu bhava nidhi tarai na koī | jauṃ birañci saṅkara sama hoī ||
saṃsaya sarpa graseu mohi tātā | dukhada lahari kutarka bahu brātā ||

93.4

तव सरूप गारुड़ि रघुनायक । मोहि जिआयउ जन सुखदायक ॥
तव प्रसाद मम मोह नसाना । राम रहस्य अनूपम जाना ॥

tava sarūpa gārur̤i raghunāyaka | mohi jiāyau jana sukhadāyaka ||
tava prasāda mama moha nasānā | rāma rahasya anūpama jānā ||

दो॰ 93 (क)दोहा

ताहि प्रसंसि बिबिध बिधि, सीस नाइ कर जोरि ।
बचन बिनीत सप्रेम मृदु, बोलेउ गरुड़ बहोरि ॥

tāhi prasaṃsi bibidha bidhi, sīsa nāi kara jori |
bacana binīta saprema mṛdu, boleu garur̤a bahori ||

दो॰ 93 (ख)दोहा

प्रभु अपने अबिबेक ते, बूझउँ स्वामी तोहि ।
कृपासिन्धु सादर कहहु, जानि दास निज मोहि ॥

prabhu apane abibeka te, būjhaum̐ svāmī tohi |
kṛpāsindhu sādara kahahu, jāni dāsa nija mohi ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0