उत्तरकाण्ड

अध्याय 90: आधार बिना कुछ नहीं टिकता, भक्ति भी नहीं

6 श्लोक · 90 में से 130

इस अध्याय में क्या होता है

आधार बिना कुछ नहीं टिकता, भक्ति भी नहीं

काकभुशुण्डि गरुड़ के आगे प्रश्नों की लड़ी जारी रखते हैं; हर प्रश्न किसी फल को उसके आधार से जोड़ता है। सन्तोष बिना काम नहीं मिटता, और काम रहते सपने में भी सुख नहीं। क्या राम-भजन बिना काम मिटे, जैसे धरती बिना पेड़ उगे? विज्ञान बिना समता नहीं, जैसे आकाश बिना अवकाश नहीं; श्रद्धा बिना धर्म नहीं, जैसे पृथ्वी बिना गन्ध नहीं। तप से तेज आता है, ज्ञानियों की सेवा से शील। विश्वास बिना कोई सिद्धि नहीं। विश्वास बिना भक्ति नहीं, भक्ति बिना राम नहीं पिघलते, और उनकी कृपा बिना जीव को विश्राम नहीं। इसलिए कुतर्क और संशय छोड़कर करुणाकर रघुवीर को भजो।

90.1

बिनु सन्तोष न काम नसाहीं । काम अछत सुख सपनेहुँ नाहीं ॥
राम भजन बिनु मिटहिं कि कामा । थल बिहीन तरु कबहुँ कि जामा ॥

binu santoṣa na kāma nasāhīṃ | kāma achata sukha sapanehum̐ nāhīṃ ||
rāma bhajana binu miṭahiṃ ki kāmā | thala bihīna taru kabahum̐ ki jāmā ||

90.2

बिनु विज्ञान कि समता आवइ । कोउ अवकास कि नभ बिनु पावइ ॥
सदा बिना धरम नहिँ होई । बिनु महि गन्ध कि पावइ कोई ॥

binu vijñāna ki samatā āvai | kou avakāsa ki nabha binu pāvai ||
sadā binā dharama nahim̐ hoī | binu mahi gandha ki pāvai koī ||

90.3

बिनु तप-तेज कि कर बिस्तारा । जल बिनु रस कि होइ संसारा ॥
सील कि मिल बिनु बुध सेवकाई । जिमि बिनु तेज न रूप गोसाँई ॥

binu tapa-teja ki kara bistārā | jala binu rasa ki hoi saṃsārā ||
sīla ki mila binu budha sevakāī | jimi binu teja na rūpa gosām̐ī ||

90.4

निज सुख बिनु मन होइ कि थीरा । परस कि होइ बिहीन समीरा ॥
कवनिउँ सिद्धि कि बिनु बिस्वासा । बिनु हरि भजन न भव भय नासा ॥

nija sukha binu mana hoi ki thīrā | parasa ki hoi bihīna samīrā ||
kavanium̐ siddhi ki binu bisvāsā | binu hari bhajana na bhava bhaya nāsā ||

दो॰ 90 (क)दोहा

बिनु बिस्वास भगति नहिँ, तेहि बिनु द्रवहिँ न राम ।
राम कृपा बिनु सपनेहुँ, जीव न लह बिश्रामु ॥

binu bisvāsa bhagati nahim̐, tehi binu dravahim̐ na rāma |
rāma kṛpā binu sapanehum̐, jīva na laha biśrāmu ||

90.सो॰ 90 (ख)सोरठा

अंस विचार मतिधीर, तजि कुतर्क संसय सकल ।
भजहु राम रघुबीर, करुनाकर सुन्दर सुखद ॥

aṃsa vicāra matidhīra, taji kutarka saṃsaya sakala |
bhajahu rāma raghubīra, karunākara sundara sukhada ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0