उत्तरकाण्ड

अध्याय 9: सजी हुई नगरी में प्रभु का प्रवेश

7 श्लोक · 9 में से 130

इस अध्याय में क्या होता है

सजी हुई नगरी में प्रभु का प्रवेश

हर घर अपने द्वार पर सजे हुए सोने के कलश रखता है और बन्दनवार व पताकाएँ लगाता है। गलियाँ सुगन्धित जल से सींची जाती हैं, गजमुक्ताओं से चौक पूरे जाते हैं और नगर में नगाड़े बजते हैं। स्त्रियाँ न्योछावर करती हैं, आशीष देती हैं और दुःख हरने वाले प्रभु की आरती उतारती हैं। भगवान शिव उमा से कहते हैं, वेद, शेष और शारदा भी यह चरित देखकर ठगे रह जाते हैं, फिर मनुष्य इसे कैसे कहे? अवध की स्त्रियाँ विरह के सूर्य में मुँदी कुमुदिनी जैसी थीं; अब राम-चन्द्र को देखकर खिल उठती हैं। आकाश में नगाड़े बजते हैं और भगवान भवन को चलते हैं।

9.1

कञ्चन कलस बिचित्र संवारे । सबहिं धरे सजि निज निज द्वारे ॥
बन्दनवार पताका केतू । सबन्हि बनाये मङ्गल हेतू ॥

kañcana kalasa bicitra saṃvāre | sabahiṃ dhare saji nija nija dvāre ||
bandanavāra patākā ketū | sabanhi banāye maṅgala hetū ||

9.2

बीथीं सकल सुगन्ध सिंचाई । गजमनि रचि बहु चौक पुराई ॥
नाना भाँति सुमङ्गल साजे । हरषि नगर निसान बहु बाजे ॥

bīthīṃ sakala sugandha siṃcāī | gajamani raci bahu cauka purāī ||
nānā bhām̐ti sumaṅgala sāje | haraṣi nagara nisāna bahu bāje ||

9.3

जहँ तहँ नारि निछावर करहीं । देहिँ असीस हरष उर भरहीं ॥
कञ्चन थार आरती नाना । जुबती सजें करहिँ सुभ माना ॥

jaham̐ taham̐ nāri nichāvara karahīṃ | dehim̐ asīsa haraṣa ura bharahīṃ ||
kañcana thāra āratī nānā | jubatī sajeṃ karahim̐ subha mānā ||

9.4

करहिँ आरती आरति-हर कें । रघुकुल-कमल-बिपिन दिनकर कें ॥
पुर सोभा सम्पति कल्याना । निगम सेष सारदा बखाना ॥

karahim̐ āratī ārati-hara keṃ | raghukula-kamala-bipina dinakara keṃ ||
pura sobhā sampati kalyānā | nigama seṣa sāradā bakhānā ||

9.5

तेउ यह चरित देखि ठगि रहहीं । उमा तासु गुन नर किमि कहहीँ ॥

teu yaha carita dekhi ṭhagi rahahīṃ | umā tāsu guna nara kimi kahahīm̐ ||

दो॰ 9 (क)दोहा

नारि कुमुदिनीं अवध सर, रघुपति बिरह दिनेस ।
अस्त भये बिगसत भईँ, निरखि राम राकेस ॥

nāri kumudinīṃ avadha sara, raghupati biraha dinesa |
asta bhaye bigasata bhaīm̐, nirakhi rāma rākesa ||

दो॰ 9 (ख)दोहा

होहिँ सगुन सुभ बिबिध बिधि, बाजहिँ गगन निसान ।
पुर नर नारि सनाथ करि, भवन चले भगवान ॥

hohim̐ saguna subha bibidha bidhi, bājahim̐ gagana nisāna |
pura nara nāri sanātha kari, bhavana cale bhagavāna ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0