लङ्कापति कपीस नल नीला । जामवम्त अङ्गद सुभसीला ॥
हनुमदादि सब बानर बीरा । धरे मनोहर मनुज सरीरा ॥
laṅkāpati kapīsa nala nīlā | jāmavamta aṅgada subhasīlā ||
hanumadādi saba bānara bīrā | dhare manohara manuja sarīrā ||
7 श्लोक · 8 में से 130
विभीषण, सुग्रीव, जाम्बवान, अंगद, हनुमान आदि वानर वीरों ने सुन्दर मनुष्य-शरीर धारण कर लिए हैं। वे भरत के प्रेम और व्रत की तथा नगरवासियों की भक्ति की सराहना करते हैं। श्रीराम सखाओं से गुरु के चरणों में प्रणाम करने को कहते हैं: गुरु वसिष्ठ हमारे कुलपूज्य हैं, इन्हीं की कृपा से राक्षस मारे गए। फिर मुनि से कहते हैं: ये सखा युद्ध-सागर में मेरे बेड़े बने। मेरे लिए इन्होंने प्राण दाँव पर लगाए, ये मुझे भरत से भी अधिक प्रिय हैं। सब आनन्द में मग्न हो जाते हैं। वे कौसल्या को प्रणाम करते हैं, जो कहती हैं, तुम मुझे रघुनाथ जैसे प्रिय हो। फूल बरसते हैं और प्रभु भवन की ओर चलते हैं।
लङ्कापति कपीस नल नीला । जामवम्त अङ्गद सुभसीला ॥
हनुमदादि सब बानर बीरा । धरे मनोहर मनुज सरीरा ॥
laṅkāpati kapīsa nala nīlā | jāmavamta aṅgada subhasīlā ||
hanumadādi saba bānara bīrā | dhare manohara manuja sarīrā ||
भरत सनेह सील ब्रत नेमा । सादर सब बरनहिँ अति प्रेमा ॥
देखि नगरबासिन्ह का रीती । सकल सराहहिं प्रभु-पद-प्रीती ॥
bharata saneha sīla brata nemā | sādara saba baranahim̐ ati premā ||
dekhi nagarabāsinha kā rītī | sakala sarāhahiṃ prabhu-pada-prītī ||
पुनि रघुपति सब सखा बोलाये । मुनि-पद लागहु सकल सिखाये ॥
गुरु बसिष्ट कुलपूज्य हमारे । इन्ह की कृपाँ दनुज रन मारे ॥
puni raghupati saba sakhā bolāye | muni-pada lāgahu sakala sikhāye ||
guru basiṣṭa kulapūjya hamāre | inha kī kṛpām̐ danuja rana māre ||
ये सब सखा सुनहु मुनि मेरे । भए समर सागर कहं बेरे ॥
मम हित लागि जनम इन्ह हारे । भरतहु ते मोहि अधिक पिआरे ॥
ye saba sakhā sunahu muni mere | bhae samara sāgara kahaṃ bere ||
mama hita lāgi janama inha hāre | bharatahu te mohi adhika piāre ||
सुनि प्रभु बचन मगन सब भये । निमिष निमिष उपजत सुख नये ॥
suni prabhu bacana magana saba bhaye | nimiṣa nimiṣa upajata sukha naye ||
कौसल्या के चरनन्हि, पुनि तिन्ह नायउ साथ ।
आसिष दीन्ही हरषि तुम्ह, प्रिय मम जिमि रघुनाथ ॥
kausalyā ke carananhi, puni tinha nāyau sātha |
āsiṣa dīnhī haraṣi tumha, priya mama jimi raghunātha ||
सुमन वृष्टि नभ सङ्कुल, भवन चले सुखकन्द ।
चढ़ी अटारिन्ह देखहिँ, नगर नारी नर बृन्द ॥
sumana vṛṣṭi nabha saṅkula, bhavana cale sukhakanda |
car̤hī aṭārinha dekhahim̐, nagara nārī nara bṛnda ||
पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0