उत्तरकाण्ड

अध्याय 10: कैकेयी को सान्त्वना, राज्याभिषेक की तैयारी

6 श्लोक · 10 में से 130

इस अध्याय में क्या होता है

कैकेयी को सान्त्वना, राज्याभिषेक की तैयारी

भगवान शिव भवानी से कहते हैं, प्रभु ने जाना कि कैकेयी लज्जित हैं, इसलिए पहले उन्हीं के घर गए, बहुत प्रकार से समझाकर सुख दिया, और फिर अपने भवन गए। गुरु वसिष्ठ ब्राह्मणों को बुलाकर कहते हैं, आज शुभ दिन है, आप आज्ञा दें कि रामचन्द्र सिंहासन पर बैठें। ब्राह्मणों को ये वचन बहुत भाते हैं; वे कहते हैं, राम का अभिषेक जगत को आनन्द देगा, अब देर न कीजिए, महाराज का तिलक कीजिए। तब मुनि सुमन्त्र से कहते हैं, और वे हर्षित होकर रथ, घोड़े और हाथी सजा देते हैं। दूत भेजकर मंगल-द्रव्य मँगाए जाते हैं, और सुमन्त्र लौटकर वसिष्ठ के चरणों में सिर नवाते हैं।

10.1

प्रभु जानी कैकेई लजानी । प्रथम तासु गृह गये भवानी ॥
ताहि प्रबोधि बहुत सुख दीन्हा । पुनि निज भवन गवन हरि कीन्हा ॥

prabhu jānī kaikeī lajānī | prathama tāsu gṛha gaye bhavānī ||
tāhi prabodhi bahuta sukha dīnhā | puni nija bhavana gavana hari kīnhā ||

10.2

कृपासिन्धु निज मन्दिर गये । पुर नर नारि सुखी सब भये ॥
गुरु बसिष्ठ द्विज लिये बुलाई । आज सुघरी सुदिन समुदाई ॥

kṛpāsindhu nija mandira gaye | pura nara nāri sukhī saba bhaye ||
guru basiṣṭha dvija liye bulāī | āja sugharī sudina samudāī ||

10.3

सब द्विज देहु हरषि अनुसासन । रामचन्द्र बैठहिँ सिंहासन ॥
मुनि बसिष्ठ के बचन सुहाये । सुनत सकल बिप्रन्ह अति भाये ॥

saba dvija dehu haraṣi anusāsana | rāmacandra baiṭhahim̐ siṃhāsana ||
muni basiṣṭha ke bacana suhāye | sunata sakala bipranha ati bhāye ||

10.4

कहहिं बचन मृदु बिप्र अनेका । जग अभिराम राम अभिषेका ॥
अब मुनिबर बिलम्ब नहिँ कीजै । महाराज कहँ तिलक करीजै ॥

kahahiṃ bacana mṛdu bipra anekā | jaga abhirāma rāma abhiṣekā ||
aba munibara bilamba nahim̐ kījai | mahārāja kaham̐ tilaka karījai ||

दो॰ 10 (क)दोहा

तब मुनि कहेउ सुमन्त्र सन, सुनत चलेउ हरषाइ ।
रथ अनेक बहु बाजि गज, तुरत सँवारे जाइ ॥

taba muni kaheu sumantra sana, sunata caleu haraṣāi |
ratha aneka bahu bāji gaja, turata sam̐vāre jāi ||

दो॰ 10 (ख)दोहा

जहँ तहँ धावन पठइ पुनि, मङ्गल द्रव्य मगाइ ।
हरष समेत बसिष्ठ-पद, पुनि सिर नायउ आइ ॥

jaham̐ taham̐ dhāvana paṭhai puni, maṅgala dravya magāi |
haraṣa sameta basiṣṭha-pada, puni sira nāyau āi ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0