उत्तरकाण्ड

अध्याय 88: शिशु श्रीराम का वरदान और अवध का आनन्द

6 श्लोक · 88 में से 130

इस अध्याय में क्या होता है

शिशु श्रीराम का वरदान और अवध का आनन्द

काकभुशुण्डि गरुड़ को बताते हैं कि बालक श्रीराम के उदर का दर्शन कैसे पूरा हुआ। प्रभु ने वचन दिया कि काल उन्हें कभी नहीं व्यापेगा, और निरन्तर स्मरण-भजन करने को कहा। भुशुण्डि वे वचन सुनते तृप्त न होते थे। वह सुख मन और कान जानते हैं, शोभा नेत्र जानते हैं, पर जीभ नहीं कह सकती। फिर प्रभु फिर शिशु बन गए। आँखें भर आईं, मुँह रूठा-सा किया और माता को ऐसे देखा मानो बहुत भूखे हों। माता दौड़ीं, गोद में लेकर दूध पिलाया और रघुबर के चरित गाने लगीं। दोहा कहता है कि इसी सुख के लिए शिव ने अमंगल वेष धरा; जिसने स्वप्न में भी इसका लेश पाया, वह ब्रह्मसुख को कुछ नहीं गिनता।

88.1

कबहूँ काल न व्यापिहि तोही । सुमिरेसु भजेसु निरन्तर मोही ॥
प्रभु बचनामृत सुनि न अघाऊँ । तनु पुलकित मन अति हरषाऊँ ॥

kabahūm̐ kāla na vyāpihi tohī | sumiresu bhajesu nirantara mohī ||
prabhu bacanāmṛta suni na aghāūm̐ | tanu pulakita mana ati haraṣāūm̐ ||

88.2

सो सुख जानइ मन अरु काना । नहिं रसना पहिँ जाइ बखाना ॥
प्रभु सोभा सुख जानहिं नयना । कहि किमि सकहिँ तिन्हहिं नहिँ बयना ॥

so sukha jānai mana aru kānā | nahiṃ rasanā pahim̐ jāi bakhānā ||
prabhu sobhā sukha jānahiṃ nayanā | kahi kimi sakahim̐ tinhahiṃ nahim̐ bayanā ||

88.3

बहु बिधि मोहि प्रबोधि सुख देई । लगे करन सिसु कौतुक तेई ॥
सजल नयन कछु मुख करि रूखा । चितइ मातु लागी अति भूखा ॥

bahu bidhi mohi prabodhi sukha deī | lage karana sisu kautuka teī ||
sajala nayana kachu mukha kari rūkhā | citai mātu lāgī ati bhūkhā ||

88.4

देखि मातु आतुर उठि धाई । कहि मृदु बचन लिये उर लाई ॥
गोद राखि कराव पय पाना । रघुबर चरित ललित कर गाना ॥

dekhi mātu ātura uṭhi dhāī | kahi mṛdu bacana liye ura lāī ||
goda rākhi karāva paya pānā | raghubara carita lalita kara gānā ||

88.सो॰ 88 (क)सोरठा

जेहि सुख लागि पुरारि, असुभ बेष कृत सिव सुखद ।
अवधपुरी नर नारि, तेहि सुख महँ सन्तत मगन ॥

jehi sukha lāgi purāri, asubha beṣa kṛta siva sukhada |
avadhapurī nara nāri, tehi sukha maham̐ santata magana ||

दो॰ 88 (ख)दोहा

सोइ सुख लवलेस, जिन्ह बारक सपनेहुँ लहेउ ।
ते नहिँ गनहिँ खगेस, ब्रह्म-सुखहि सज्जन सुमति ॥

soi sukha lavalesa, jinha bāraka sapanehum̐ laheu |
te nahim̐ ganahim̐ khagesa, brahma-sukhahi sajjana sumati ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0