उत्तरकाण्ड

अध्याय 86: श्रीराम का सिद्धान्त: भक्त से प्रिय कोई नहीं

6 श्लोक · 86 में से 130

इस अध्याय में क्या होता है

श्रीराम का सिद्धान्त: भक्त से प्रिय कोई नहीं

श्रीराम भुशुण्डि से आगे कहते हैं: मेरा सत्य, सुगम सिद्धान्त सुनो और सब छोड़कर मुझे भजो। यह संसार मेरी माया से उपजा है, अनेक प्रकार के चर-अचर जीवों सहित। सब मुझे प्रिय हैं, क्योंकि सब मेरे ही उपजाए हैं, पर मनुष्य मुझे सबसे अधिक भाते हैं। मनुष्यों में द्विज, द्विजों में वेदधारी, उनमें वेद-धर्म पर चलने वाले; उनमें विरक्त प्रिय, फिर ज्ञानी, और ज्ञानी से भी अधिक प्रिय विज्ञानी। उनसे भी प्रिय मेरा दास है, जिसे मेरी ही गति है, दूसरी आशा नहीं। बार-बार सत्य कहता हूँ, मुझे सेवक के समान प्रिय कोई नहीं। भक्तिहीन ब्रह्मा भी हों तो मुझे सब जीवों के समान हैं, और भक्तिमान अत्यन्त नीच प्राणी भी प्राणों के समान प्रिय।

86.1

अब सुनु परम बिमल मम बानी । सत्य सुगम निगमादि बखानी ॥
निज सिद्धान्त सुनावउँ तोही । सुनि मन धरु सब तजि भजु मोही ॥

aba sunu parama bimala mama bānī | satya sugama nigamādi bakhānī ||
nija siddhānta sunāvaum̐ tohī | suni mana dharu saba taji bhaju mohī ||

86.2

मम माया सम्भव संसारा । जीव चराचर विविध प्रकारा ॥
सम मम प्रिय सब सम उपजाये । सब से अधिक मनुज मोहि भाये ॥

mama māyā sambhava saṃsārā | jīva carācara vividha prakārā ||
sama mama priya saba sama upajāye | saba se adhika manuja mohi bhāye ||

86.3

तिन्ह महँ द्विज द्विज महँ श्रुतिधारी । तिन्ह महँ निगम-धर्म अनुसारी ॥
तिन्ह महँ प्रिय बिरक्त पुनि ज्ञानी । ज्ञानिहु ते अति प्रिय विज्ञानी ॥

tinha maham̐ dvija dvija maham̐ śrutidhārī | tinha maham̐ nigama-dharma anusārī ||
tinha maham̐ priya birakta puni jñānī | jñānihu te ati priya vijñānī ||

86.4

तिन्ह ते पुनि मोहि प्रिय निज दासा । जेहि गति मोरि न दूसरि आसा ॥
पुनि पुनि सत्य कहउँ तोहि पाहीं । मोहि सेवक सम प्रिय कोउ नाहीं ॥

tinha te puni mohi priya nija dāsā | jehi gati mori na dūsari āsā ||
puni puni satya kahaum̐ tohi pāhīṃ | mohi sevaka sama priya kou nāhīṃ ||

86.5

भगति हीन बिरञ्चि किन होई । सब जीवहु सम प्रिय मोहि खाई ॥
भगतिवंत अति नीचउ प्रानी । मोहि प्रानप्रिय असि मम बानी ॥

bhagati hīna birañci kina hoī | saba jīvahu sama priya mohi khāī ||
bhagativaṃta ati nīcau prānī | mohi prānapriya asi mama bānī ||

दो॰ 86दोहा

सुचि सुसील सेवक सुमति, प्रिय कहु काहि न लाग ।
श्रुति पुरान कह नीति असि, सावधान सुनु काग ॥

suci susīla sevaka sumati, priya kahu kāhi na lāga |
śruti purāna kaha nīti asi, sāvadhāna sunu kāga ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0