एवमस्तु कहि रघुकुलनायक । बोले बचन परम सुखदायक ॥
सुनु बायस ते सहज सयाना । काहे न मागसि, अस बरदाना ॥
evamastu kahi raghukulanāyaka | bole bacana parama sukhadāyaka ||
sunu bāyasa te sahaja sayānā | kāhe na māgasi, asa baradānā ||
6 श्लोक · 85 में से 130
एवमस्तु कहकर रघुकुल-नायक परम सुख देने वाले वचन बोले: तुमने सब सुखों की खान भक्ति माँगी, संसार में तुम्हारे समान बड़भागी कोई नहीं। मुनि करोड़ों यत्नों से भी इसे नहीं पाते। तुम्हारी चतुराई देखकर मैं रीझ गया; तुम्हारा भक्ति माँगना मुझे बहुत भाया। अब मेरे प्रसाद से सब शुभ गुण तुम्हारे हृदय में बसेंगे। भक्ति, ज्ञान, विज्ञान, वैराग्य, योग, मेरे चरित्र और उनके रहस्य, इन सबका भेद तुम मेरी कृपा से जानोगे, साधन का कष्ट नहीं होगा। माया से उपजा कोई भ्रम अब तुम्हें नहीं व्यापेगा। मुझे अनादि, अजन्मा, निर्गुण और गुणों की खान ब्रह्म जानना। मुझे भक्त सदा प्रिय है; यह विचारकर तन, वचन और मन से मेरे चरणों में अचल प्रेम करना।
एवमस्तु कहि रघुकुलनायक । बोले बचन परम सुखदायक ॥
सुनु बायस ते सहज सयाना । काहे न मागसि, अस बरदाना ॥
evamastu kahi raghukulanāyaka | bole bacana parama sukhadāyaka ||
sunu bāyasa te sahaja sayānā | kāhe na māgasi, asa baradānā ||
सब सुख खानि भगति तैं मागी । नहिं जग कोउ तोहि सम बड़भागी ॥
जो मुनि कोटि जतन नहिँ लहहीं । जे जप जोग अनल तन दहहीं ॥
saba sukha khāni bhagati taiṃ māgī | nahiṃ jaga kou tohi sama bar̤abhāgī ||
jo muni koṭi jatana nahim̐ lahahīṃ | je japa joga anala tana dahahīṃ ||
रीझेउँ देखि तोरि चतुराई । मागेहु भगति मोहि अति भाई ॥
सुनु बिहँग प्रसाद अब मोरें । सब सुभ गुन बसिहहिँ उर तोरें ॥
rījheum̐ dekhi tori caturāī | māgehu bhagati mohi ati bhāī ||
sunu biham̐ga prasāda aba moreṃ | saba subha guna basihahim̐ ura toreṃ ||
भगति ज्ञान बिज्ञान बिरागा । जोग चरित्र रहस्य विभागा ॥
जानब से सबही कर भेदा । मम प्रसाद नहिँ साधन खेदा ॥
bhagati jñāna bijñāna birāgā | joga caritra rahasya vibhāgā ||
jānaba se sabahī kara bhedā | mama prasāda nahim̐ sādhana khedā ||
माया सम्भव भ्रम सब, अब न व्यापिहहिं तोहि ।
जानेसु ब्रह्म अनादि अज, अगुन गुनाकर मोहि ॥
māyā sambhava bhrama saba, aba na vyāpihahiṃ tohi |
jānesu brahma anādi aja, aguna gunākara mohi ||
मोहि भगत प्रिय सन्तत, अस बिचारि सुनु काग ।
कायँ बचन मन मम पद, करेसु अचल अनुराग ॥
mohi bhagata priya santata, asa bicāri sunu kāga |
kāyam̐ bacana mana mama pada, karesu acala anurāga ||
पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0