उत्तरकाण्ड

अध्याय 83: कौए के सिर पर श्रीराम का कर-कमल

6 श्लोक · 83 में से 130

इस अध्याय में क्या होता है

कौए के सिर पर श्रीराम का कर-कमल

भुशुण्डि गरुड़ से कहते हैं, यह चरित और प्रभुता देखकर, समझते ही मैं देह की सुध भूल गया और धरती पर गिर पड़ा; मुँह से बात नहीं निकली, बस पुकारा: हे आर्तों के रक्षक, त्राहि, त्राहि! मुझे प्रेम से व्याकुल देख प्रभु ने अपनी माया की प्रभुता रोक ली और अपना कर-कमल मेरे सिर पर रखा; दीनदयाल ने सब दुःख हर लिए। प्रभु की भक्त-वत्सलता देखकर हृदय में विशेष प्रीति उपजी। सजल नेत्र, पुलकित शरीर और जुड़े हाथों से मैंने अनेक प्रकार से विनती की। तब रमानिवास कोमल वचन बोले: काकभुशुण्डि, मुझे अत्यन्त प्रसन्न जानकर वर माँगो; अणिमा आदि सिद्धियाँ, दूसरी ऋद्धियाँ, सब सुखों की खान मोक्ष।

83.1

देखि चरित यह सो प्रभुताई । समुझत देह दसा बिसराई ॥
धरनि परेउँ मुख आव न बाता । त्राहि त्राहि आरत जन त्राता ॥

dekhi carita yaha so prabhutāī | samujhata deha dasā bisarāī ||
dharani pareum̐ mukha āva na bātā | trāhi trāhi ārata jana trātā ||

83.2

प्रेमाकुल प्रभु मोहि बिलोकी । निज माया प्रभुता तब रोकी ॥
कर सरोज प्रभु मम सिर धरेऊ । दीनदयाल सकल दुख हरेऊ ॥

premākula prabhu mohi bilokī | nija māyā prabhutā taba rokī ||
kara saroja prabhu mama sira dhareū | dīnadayāla sakala dukha hareū ||

83.3

कीन्ह राम मोहि बिगत बिमोहा । सेवक सुखद कृपा सन्दोहा ॥
प्रभुता प्रथम बिचारि बिचारी । मन महँ होइ हरष अति भारी ॥

kīnha rāma mohi bigata bimohā | sevaka sukhada kṛpā sandohā ||
prabhutā prathama bicāri bicārī | mana maham̐ hoi haraṣa ati bhārī ||

83.4

भगत बछलता प्रभु कै देखी । उपजी मम उर प्रीति बिसेखी ॥
सजल नयन पुलकित कर जोरी । कीन्हिउँ बहु बिधि बिनय बहोरी ॥

bhagata bachalatā prabhu kai dekhī | upajī mama ura prīti bisekhī ||
sajala nayana pulakita kara jorī | kīnhium̐ bahu bidhi binaya bahorī ||

दो॰ 83 (क)दोहा

सुनि सप्रेम सम बानी, देखि दीन निज दास ।
बचन सुखद गंभीर मृदु, बोले रमानिवास ॥

suni saprema sama bānī, dekhi dīna nija dāsa |
bacana sukhada gaṃbhīra mṛdu, bole ramānivāsa ||

दो॰ 83 (ख)दोहा

काकभसुंडि मागु बर, अति प्रसन्न मोहि जानि ।
अनिमादिक सिधि अपर रिधि, मोच्छ सकल सुख खानि ॥

kākabhasuṃḍi māgu bara, ati prasanna mohi jāni |
animādika sidhi apara ridhi, moccha sakala sukha khāni ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0