उत्तरकाण्ड

अध्याय 82: सौ कल्प बाद प्रभु के मुख से बाहर

6 श्लोक · 82 में से 130

इस अध्याय में क्या होता है

सौ कल्प बाद प्रभु के मुख से बाहर

भुशुण्डि गरुड़ से कहते हैं, अनेक ब्रह्माण्डों में भटकते मानो सौ कल्प बीत गए। घूमते-घूमते मैं अपने आश्रम में आया और वहाँ कुछ समय रहा। फिर अवध में अपने प्रभु का जन्म सुनकर प्रेम से भरकर हर्षित हो उठ दौड़ा, और जाकर वह जन्म-महोत्सव देखा जिसका वर्णन मैंने पहले किया। राम के उदर में मैंने अनेक जगत देखे, और वहाँ फिर माया-पति श्रीराम को देखा। बार-बार विचार करता रहा, मेरी बुद्धि मोह के कीचड़ से ढकी थी, पर यह सब मैंने केवल दो घड़ी में देखा था। मुझे व्याकुल देखकर रघुवीर हँसे, और हँसते ही मैं मुख से बाहर आ गया। फिर श्रीराम मुझसे वही लड़कपन करने लगे; मैं करोड़ों प्रकार से मन को समझाता, पर मन को विश्राम नहीं मिला।

82.1

भ्रमत मोहि ब्रह्मांड अनेका । बीते मनहुँ कलप सत एका ॥
फिरत फिरत निज आश्रम आयउँ । तहँ पुनि रहि कछु काल गवाँयउँ ॥

bhramata mohi brahmāṃḍa anekā | bīte manahum̐ kalapa sata ekā ||
phirata phirata nija āśrama āyaum̐ | taham̐ puni rahi kachu kāla gavām̐yaum̐ ||

82.2

निज प्रभु जनम अवध सुनि पायउँ । निर्भर प्रेम हरषि उठि धायउँ ॥
देखउँ जन्म-महोत्सव जाई । जेहि बिधि प्रथम कहा मैं गाई ॥

nija prabhu janama avadha suni pāyaum̐ | nirbhara prema haraṣi uṭhi dhāyaum̐ ||
dekhaum̐ janma-mahotsava jāī | jehi bidhi prathama kahā maiṃ gāī ||

82.3

राम उदर देखेउँ जग नाना । देखत बनइ न जाइ बखाना ॥
तहँ पुनि देखेउँ राम सुजाना । माया पति कृपाल भगवाना ॥

rāma udara dekheum̐ jaga nānā | dekhata banai na jāi bakhānā ||
taham̐ puni dekheum̐ rāma sujānā | māyā pati kṛpāla bhagavānā ||

82.4

करउँ बिचार बहोरी बहोरी । मोह कलिल व्यापित मति मोरी ॥
उभय घरी महँ मैं सब देखा । भयउँ भ्रमित मन मोह बिसेखा ॥

karaum̐ bicāra bahorī bahorī | moha kalila vyāpita mati morī ||
ubhaya gharī maham̐ maiṃ saba dekhā | bhayaum̐ bhramita mana moha bisekhā ||

दो॰ 82 (क)दोहा

देखि कपाल बिकल मोहि, बिहँसे तब रघुबीर ।
बिहँसतहीं सुख बाहेर, आयउँ सुनु मतिधीर ॥

dekhi kapāla bikala mohi, biham̐se taba raghubīra |
biham̐satahīṃ sukha bāhera, āyaum̐ sunu matidhīra ||

दो॰ 82 (ख)दोहा

सोइ लरिकाई मो सन, करन लगे पुनि राम ।
कोटि भाँति समुझावउँ, मन न लहइ बिश्राम ॥

soi larikāī mo sana, karana lage puni rāma |
koṭi bhām̐ti samujhāvaum̐, mana na lahai biśrāma ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0