भुशुण्डि गरुड़ से कहते हैं, अनेक ब्रह्माण्डों में भटकते मानो सौ कल्प बीत गए। घूमते-घूमते मैं अपने आश्रम में आया और वहाँ कुछ समय रहा। फिर अवध में अपने प्रभु का जन्म सुनकर प्रेम से भरकर हर्षित हो उठ दौड़ा, और जाकर वह जन्म-महोत्सव देखा जिसका वर्णन मैंने पहले किया। राम के उदर में मैंने अनेक जगत देखे, और वहाँ फिर माया-पति श्रीराम को देखा। बार-बार विचार करता रहा, मेरी बुद्धि मोह के कीचड़ से ढकी थी, पर यह सब मैंने केवल दो घड़ी में देखा था। मुझे व्याकुल देखकर रघुवीर हँसे, और हँसते ही मैं मुख से बाहर आ गया। फिर श्रीराम मुझसे वही लड़कपन करने लगे; मैं करोड़ों प्रकार से मन को समझाता, पर मन को विश्राम नहीं मिला।