उत्तरकाण्ड

अध्याय 84: भुशुण्डि केवल निर्मल भक्ति माँगते हैं

6 श्लोक · 84 में से 130

इस अध्याय में क्या होता है

भुशुण्डि केवल निर्मल भक्ति माँगते हैं

श्रीराम कौए को ज्ञान, वैराग्य, विज्ञान और मुनियों को दुर्लभ सब गुण देने को कहते हैं। भुशुण्डि गरुड़ से कहते हैं, प्रभु के वचन सुनकर मेरा अनुराग और बढ़ा और मैं मन में विचारने लगा। प्रभु ने सब सुख देने की बात कही, पर अपनी भक्ति देने की बात नहीं कही। भक्ति के बिना सब गुण और सुख कैसे, जैसे बिना नमक के बहुत-से व्यंजन। भजन के बिना सुख किस काम का? यह विचारकर मैं बोला: हे प्रभु, यदि आप प्रसन्न होकर वर देते हैं, तो मुझ पर कृपा और स्नेह कीजिए। आपकी वह अविरल, विशुद्ध भक्ति दीजिए, जिसे श्रुति और पुराण गाते हैं, जिसे योगीश्वर खोजते हैं। हे भक्त-कल्पतरु, कृपासिन्धु राम, दया करके वही भक्ति मुझे दीजिए।

84.1

ज्ञान विवेक बिरति विज्ञाना । मुनि दुर्लभ गुन जे जग जाना ॥
आजु देउँ सब संसय नाहीं । माँगु जो तोहि मान रन माहीं ॥

jñāna viveka birati vijñānā | muni durlabha guna je jaga jānā ||
āju deum̐ saba saṃsaya nāhīṃ | mām̐gu jo tohi māna rana māhīṃ ||

84.2

सुनि प्रभु बचन अधिक अनुरागेउँ । मन अनुमान करना लागेउँ ॥
प्रभु कह देन सकल सुख सही । भगति आपनी देन न कही ॥

suni prabhu bacana adhika anurāgeum̐ | mana anumāna karanā lāgeum̐ ||
prabhu kaha dena sakala sukha sahī | bhagati āpanī dena na kahī ||

84.3

भगति हीन गुन सब सुख कैसे । लवन बिना बहु बिञ्जन जैसे ॥
भजन हीन सुख कवने काजा । अस बिचारि बोलेउँ खगराजा ॥

bhagati hīna guna saba sukha kaise | lavana binā bahu biñjana jaise ||
bhajana hīna sukha kavane kājā | asa bicāri boleum̐ khagarājā ||

84.4

जौँ प्रभु होइ प्रसन्न बर देहू । मो पर करहु कृपा अरु नेहू ॥
मन-भावत बर माँगउँ स्वामी । तुम्ह उदार उर अन्तरजामी ॥

jaum̐ prabhu hoi prasanna bara dehū | mo para karahu kṛpā aru nehū ||
mana-bhāvata bara mām̐gaum̐ svāmī | tumha udāra ura antarajāmī ||

दो॰ 84 (क)दोहा

अबिरल भगति बिसुध्द तव, श्रुति पुरान जो गाव ।
जेहि खोजत जोगीस मुनि, प्रभु प्रसाद कोउ पाव ॥

abirala bhagati bisudhda tava, śruti purāna jo gāva |
jehi khojata jogīsa muni, prabhu prasāda kou pāva ||

दो॰ 84 (ख)दोहा

भगत-कल्पतरु प्रनत हित, कृपा सिन्धु सुख धाम ।
सोइ निज भगति मोहि प्रभु, देहु दया करि राम ॥

bhagata-kalpataru pranata hita, kṛpā sindhu sukha dhāma |
soi nija bhagati mohi prabhu, dehu dayā kari rāma ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0