उत्तरकाण्ड

अध्याय 7: कौसल्या पुत्र को निहारती हैं

5 श्लोक · 7 में से 130

इस अध्याय में क्या होता है

कौसल्या पुत्र को निहारती हैं

वैदेही सब सासुओं के चरण छूती हैं। वे कुशल पूछकर आशीर्वाद देती हैं कि तुम्हारा सुहाग अचल रहे। सब रघुपति का मुख निहारती हैं और मंगल की घड़ी जानकर आँसू रोक लेती हैं। सोने के थालों में आरती उतारती हैं, न्योछावर करती हैं और बार-बार प्रभु को देखती हैं। कौसल्या पुत्र को देखती रहती हैं और मन में एक ही बात लौटती है: इसने लंका के राजा को कैसे मारा होगा? मेरे दोनों बालक तो अत्यन्त सुकुमार हैं, और राक्षस महाबली योद्धा थे। लक्ष्मण और सीता सहित प्रभु को देखती माता आनन्द में मग्न हैं, शरीर बार-बार पुलकित होता है।

7.1

सासुन्ह सबनि मिली बैदेही । चरनन्हि लागि हरष अति तेही ॥
देहिँ असीस बूझि कुसलाता । होइ अचल तुम्हार अहिवाता ॥

sāsunha sabani milī baidehī | carananhi lāgi haraṣa ati tehī ||
dehim̐ asīsa būjhi kusalātā | hoi acala tumhāra ahivātā ||

7.2

सब रघुपति मुख-कमल बिलोकहिँ । मङ्गल जानि नयन जल रोकहिँ ॥
कनक थार आरती उतारहिं । बार बार प्रभु गात निहारहिं ॥

saba raghupati mukha-kamala bilokahim̐ | maṅgala jāni nayana jala rokahim̐ ||
kanaka thāra āratī utārahiṃ | bāra bāra prabhu gāta nihārahiṃ ||

7.3

नाना भाँति निछावरि करहीं । परमानन्द हरष उर भरहीं ॥
कौसल्या पुनि पुनि रघुबीरहि । चितवति कृपासिन्धु रनधीरहि ॥

nānā bhām̐ti nichāvari karahīṃ | paramānanda haraṣa ura bharahīṃ ||
kausalyā puni puni raghubīrahi | citavati kṛpāsindhu ranadhīrahi ||

7.4

हृदयँ बिचारति बारहिँ बारा । कवन भाँति लङ्कापति मारा ॥
अति सुकुमार जुगल मेरे बारे । निसिचर सुभट महाबल भारे ॥

hṛdayam̐ bicārati bārahim̐ bārā | kavana bhām̐ti laṅkāpati mārā ||
ati sukumāra jugala mere bāre | nisicara subhaṭa mahābala bhāre ||

दो॰ 7दोहा

लछिमन अरु सीता सहित, प्रभुहि बिलोकति मातु ।
परमानन्द मगन मन, पुनि पुनि पुलकित गात ॥

lachimana aru sītā sahita, prabhuhi bilokati mātu |
paramānanda magana mana, puni puni pulakita gāta ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0