उत्तरकाण्ड

अध्याय 79: भागते कौए के पीछे श्रीराम की भुजा

6 श्लोक · 79 में से 130

इस अध्याय में क्या होता है

भागते कौए के पीछे श्रीराम की भुजा

भुशुण्डि कहते हैं, हे खगेश, हरि-भजन बिना जीवों का क्लेश नहीं मिटता। हरि के सेवक को अविद्या नहीं व्यापती; प्रभु की प्रेरणा से उसे विद्या व्यापती है, इसलिए दास का नाश नहीं होता। यही भक्ति का भेद है। मुझे भ्रम से चकित देखकर श्रीराम हँसे; आगे का कौतुक किसी ने नहीं जाना। श्याम शरीर और लाल हाथ-पैरों वाले प्रभु घुटनों और हाथों के बल मुझे पकड़ने दौड़े। मैं भागा तो राम ने भुजा फैला दी। जितना ऊँचा आकाश में उड़ता, वहाँ हरि की भुजा अपने पास ही देखता। ब्रह्मलोक तक भी भुजा बस दो अंगुल दूर थी। सातों आवरण भेदकर जहाँ तक मेरी गति थी वहाँ गया, वहाँ भी प्रभु की भुजा देखकर फिर व्याकुल हो गया।

79.1

ऐसेहिं हरि बिनु भजन खगेसा । मिटइ न जीवन्ह केर कलेसा ॥
हरि सेवकहि न ब्याप अबिद्या । प्रभु प्रेरित ब्यापइ तेहि बिद्या ॥

aisehiṃ hari binu bhajana khagesā | miṭai na jīvanha kera kalesā ||
hari sevakahi na byāpa abidyā | prabhu prerita byāpai tehi bidyā ||

79.2

ताते नास न होइ दास कर । भेद भगति बिहङ्ग बिहंगबर ॥
भ्रम से चकित राम मोहि देखा । बिहँसे सो सुनु चरित बिसेखा ॥

tāte nāsa na hoi dāsa kara | bheda bhagati bihaṅga bihaṃgabara ||
bhrama se cakita rāma mohi dekhā | biham̐se so sunu carita bisekhā ||

79.3

तेहि कौतुक कर मरम न काहूँ । जाना अनुज न मातु पिताहूँ ॥
जानु पानि धाये मोहि धरना । स्यामल गात अरुन कर चरना ॥

tehi kautuka kara marama na kāhūm̐ | jānā anuja na mātu pitāhūm̐ ||
jānu pāni dhāye mohi dharanā | syāmala gāta aruna kara caranā ||

79.4

तब मैं भागि चलेउँ उरगामी । राम गहन कहँ भुजा पसारी ॥
जिमि जिमि दूरि उड़ाउँ अकासा । तहँ भुज हरि देखउँ निज पासा ॥

taba maiṃ bhāgi caleum̐ uragāmī | rāma gahana kaham̐ bhujā pasārī ||
jimi jimi dūri ur̤āum̐ akāsā | taham̐ bhuja hari dekhaum̐ nija pāsā ||

दो॰ 79 (क)दोहा

ब्रह्मलोक लगि गयउँ मैं, चितयउँ पार उड़ात ।
जुग अङ्गुल कर बीच सब, राम भुजहि मोहि तात ॥

brahmaloka lagi gayaum̐ maiṃ, citayaum̐ pāra ur̤āta |
juga aṅgula kara bīca saba, rāma bhujahi mohi tāta ||

दो॰ 79 (ख)दोहा

सप्ताबरन भेद करि, जहाँ लगें गति मोरि ।
गयउँ तहाँ प्रभु भुज निरखि, ब्याकुल भयउँ बहोरि ॥

saptābarana bheda kari, jahām̐ lageṃ gati mori |
gayaum̐ tahām̐ prabhu bhuja nirakhi, byākula bhayaum̐ bahori ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0