उत्तरकाण्ड

अध्याय 61: शिव का उपदेश, सत्संग बिना कथा नहीं

5 श्लोक · 61 में से 130

इस अध्याय में क्या होता है

शिव का उपदेश, सत्संग बिना कथा नहीं

गरुड़ ने आदर से भगवान शिव के चरणों में सिर नवाया और अपना सन्देह सुनाया। उनकी कोमल विनती सुनकर, शिव भवानी को बताते हैं, मैंने प्रेम से कहा: हे गरुड़, तुम मुझे मार्ग में मिले हो, यहाँ तुम्हें किस प्रकार समझाऊँ? सब संशय तभी मिटते हैं जब बहुत समय तक सत्संग किया जाए और वहाँ मुनियों की गाई हरि की सुन्दर कथा सुनी जाए, जिसके आदि, मध्य और अन्त में प्रतिपाद्य भगवान श्रीराम ही हैं। भाई, जहाँ नित्य हरि-कथा होती है, वहाँ तुम्हें भेजता हूँ, जाकर सुनो। सुनते ही सारे सन्देह चले जाएँगे और राम-चरणों में अत्यन्त प्रेम होगा। दोहा यह क्रम बाँधता है: सत्संग बिना हरि-कथा नहीं, कथा बिना मोह नहीं भागता, और मोह गए बिना राम-पद में दृढ़ अनुराग नहीं होता।

61.1

तेहिं मम पद-सादर सिरु नावा । पुनि आपन सन्देह सुनावा ॥
सुनि ता करि बिनती मृदु बानी । परेम सहित में कहेउँ भवानी ॥

tehiṃ mama pada-sādara siru nāvā | puni āpana sandeha sunāvā ||
suni tā kari binatī mṛdu bānī | parema sahita meṃ kaheum̐ bhavānī ||

61.2

मिलेहु गरुड़ मारग महँ मोही । कवन भाँति समुझावौं तोही ॥
तबहिं होइ सब संसय भङ्गा । जब बहु काल करिय सतसंगा ॥

milehu garur̤a māraga maham̐ mohī | kavana bhām̐ti samujhāvauṃ tohī ||
tabahiṃ hoi saba saṃsaya bhaṅgā | jaba bahu kāla kariya satasaṃgā ||

61.3

सुनिय तहाँ हरि कथा सुहाई । नाना भाँति मुनिन्ह जो गाई ॥
जेहि महँ आदि मध्य अवसाना । प्रभु प्रतिपाद्य राम भगवाना ॥

suniya tahām̐ hari kathā suhāī | nānā bhām̐ti muninha jo gāī ||
jehi maham̐ ādi madhya avasānā | prabhu pratipādya rāma bhagavānā ||

61.4

नित हरिकथा होति जहँ भाई । पठवउँ तहाँ सुनहु तुम्ह जाई ॥
जाइहि सुनत सकल सन्देहा । राम चरन होइहि अति नेहा ॥

nita harikathā hoti jaham̐ bhāī | paṭhavaum̐ tahām̐ sunahu tumha jāī ||
jāihi sunata sakala sandehā | rāma carana hoihi ati nehā ||

दो॰ 61दोहा

बिनु सतसङ्ग न हरि कथा, तेहि बिनु मोह न भाग ।
मोह गये बिनु राम-पद, होइ न दृढ़ अनुराग ॥

binu satasaṅga na hari kathā, tehi binu moha na bhāga |
moha gaye binu rāma-pada, hoi na dṛr̤ha anurāga ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0