मिलहिँ न रघुपति बिनु अनुरागा । किये जोग तप ग्यान बिरागा ॥
उत्तर दिसि सुन्दर गिरि नीला । तहँ रह काकभुसुंडि सुसीला ॥
milahim̐ na raghupati binu anurāgā | kiye joga tapa gyāna birāgā ||
uttara disi sundara giri nīlā | taham̐ raha kākabhusuṃḍi susīlā ||
7 श्लोक · 62 में से 130
भगवान शिव गरुड़ से कहते हैं, योग, तप, ज्ञान और वैराग्य करने पर भी प्रेम के बिना रघुपति नहीं मिलते। उत्तर दिशा में सुन्दर नील पर्वत है, वहाँ सुशील काकभुशुण्डि रहते हैं; वे भक्ति-पथ में परम प्रवीण, ज्ञानी और बहुत पुराने हैं। वे निरन्तर राम-कथा कहते हैं और अनेक श्रेष्ठ पक्षी आदर से सुनते हैं। वहाँ जाकर हरि-गुण सुनो, मोह से उपजा दुःख दूर होगा। फिर शिव उमा को बताते हैं कि मैंने स्वयं क्यों नहीं समझाया: रघुपति की कृपा से मैंने भेद पा लिया। गरुड़ को कभी अभिमान हुआ होगा, कृपानिधान उसे मिटाना चाहते थे। हे भवानी, प्रभु की माया बलवती है। जो शिव और ब्रह्मा को भी मोह ले, उसके आगे बेचारा दूसरा कौन? यह जानकर मुनि माया-पति भगवान को भजते हैं।
मिलहिँ न रघुपति बिनु अनुरागा । किये जोग तप ग्यान बिरागा ॥
उत्तर दिसि सुन्दर गिरि नीला । तहँ रह काकभुसुंडि सुसीला ॥
milahim̐ na raghupati binu anurāgā | kiye joga tapa gyāna birāgā ||
uttara disi sundara giri nīlā | taham̐ raha kākabhusuṃḍi susīlā ||
धीर भगति-पथ परम-प्रबीना । ज्ञानी गुन गृह बहु कालीना ॥
राम कथा सो कहइ निरन्तर । सादर सुनहिँ बिबिध बिहंगबर ॥
dhīra bhagati-patha parama-prabīnā | jñānī guna gṛha bahu kālīnā ||
rāma kathā so kahai nirantara | sādara sunahim̐ bibidha bihaṃgabara ||
जाइ सुनहु तहँ हरि गुन भूरी । होइहि मोह जनित दुख दूरी ॥
मैं जब तेहि सब कहाँ बुझाई । चलेउ हरषि मम पद सिर नाई ॥
jāi sunahu taham̐ hari guna bhūrī | hoihi moha janita dukha dūrī ||
maiṃ jaba tehi saba kahām̐ bujhāī | caleu haraṣi mama pada sira nāī ||
ताते उमा न मैं समुझावा । रघुपति कृपाँ मरमु मैं पावा ॥
होइहि कीन्ह कबहुँ अभिमाना । सो खौवै वह कृपानिधाना ॥
tāte umā na maiṃ samujhāvā | raghupati kṛpām̐ maramu maiṃ pāvā ||
hoihi kīnha kabahum̐ abhimānā | so khauvai vaha kṛpānidhānā ||
कछु तेहि ते पुनि मैं नहिँ राखा । समुझइ खग खगही के भाखा ॥
प्रभु माया बलवन्त भवानी । जाहि न मोह कवन अस ग्यानी ॥
kachu tehi te puni maiṃ nahim̐ rākhā | samujhai khaga khagahī ke bhākhā ||
prabhu māyā balavanta bhavānī | jāhi na moha kavana asa gyānī ||
ज्ञानी भगत-सिरोमनि, त्रिभुवनपति कर जान ।
ताहि मोह माया नर, पावँर कहि गुमान ॥
jñānī bhagata-siromani, tribhuvanapati kara jāna |
tāhi moha māyā nara, pāvam̐ra kahi gumāna ||
सिव बिरञ्चि कहँ मोहइ, को है बपुरा आन ।
अस जियँ जानि भजहिँ मुनि, माया पति भगवान ॥
siva birañci kaham̐ mohai, ko hai bapurā āna |
asa jiyam̐ jāni bhajahim̐ muni, māyā pati bhagavāna ||
पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0