तेहिं गिरि रुचिर बसइ खग लाई । तासु नास कल्पांत न होई ॥
माया कृत गुन दोष अनेका । मोह मनोज आदि अबिबेका ॥
tehiṃ giri rucira basai khaga lāī | tāsu nāsa kalpāṃta na hoī ||
māyā kṛta guna doṣa anekā | moha manoja ādi abibekā ||
6 श्लोक · 57 में से 130
उस सुन्दर पर्वत पर, भगवान शिव उमा से कहते हैं, एक पक्षी रहता है जिसका नाश कल्प के अन्त में भी नहीं होता। माया से उपजे गुण-दोष, मोह, काम और अविवेक, जो सारे जगत में व्याप्त हैं, उस पर्वत के पास कभी नहीं जाते। पीपल के नीचे वह ध्यान करता है, पाकड़ के नीचे जप और यज्ञ, आम की छाया में मानस-पूजा; हरि-भजन के सिवा उसका कोई काम नहीं। बरगद के नीचे वह हरि-कथा कहता है, अनेक पक्षी सुनने आते हैं, और वह प्रेम से श्रीराम के विचित्र चरित गाता है। यह देखकर शिव के हृदय में विशेष आनन्द उपजा। उन्होंने कुछ समय हंस का शरीर धरकर वहाँ निवास किया, रघुपति के गुण सुने, फिर कैलास लौटे।
तेहिं गिरि रुचिर बसइ खग लाई । तासु नास कल्पांत न होई ॥
माया कृत गुन दोष अनेका । मोह मनोज आदि अबिबेका ॥
tehiṃ giri rucira basai khaga lāī | tāsu nāsa kalpāṃta na hoī ||
māyā kṛta guna doṣa anekā | moha manoja ādi abibekā ||
रहे व्यापि समस्त जग माहीँ । तेहि गिरि निकट कबहुँ नहिँ जाहीँ ॥
तहँ बसि हरिहि भजइ जिमि कागा । सो सुनु उमा सहित अनुरागा ॥
rahe vyāpi samasta jaga māhīm̐ | tehi giri nikaṭa kabahum̐ nahim̐ jāhīm̐ ||
taham̐ basi harihi bhajai jimi kāgā | so sunu umā sahita anurāgā ||
पीपर तरु तर ध्यान सो धरई । जाप जग्य पाकरि तर करई ॥
आँब छाहँ कर मानस-पूजा । तजि हरि भजन काज नहिँ दूजा ॥
pīpara taru tara dhyāna so dharaī | jāpa jagya pākari tara karaī ||
ām̐ba chāham̐ kara mānasa-pūjā | taji hari bhajana kāja nahim̐ dūjā ||
घर तर कह हरि कथा प्रसङ्गा । आवहिँ सुनहिँ अनेक बिहङ्गा ॥
राम चरित विचित्र विधि नाना । प्रेम सहित कर सादर गाना ॥
ghara tara kaha hari kathā prasaṅgā | āvahim̐ sunahim̐ aneka bihaṅgā ||
rāma carita vicitra vidhi nānā | prema sahita kara sādara gānā ||
सुनहिँ सकल मति बिमल मराला । बसहिँ निरन्तर जो तेहिं ताला ॥
जब मैं जाइ सो कौतुक देखा । उर उपजा आनन्द बिसेषा ॥
sunahim̐ sakala mati bimala marālā | basahim̐ nirantara jo tehiṃ tālā ||
jaba maiṃ jāi so kautuka dekhā | ura upajā ānanda biseṣā ||
तब कछु काल मराल तनु, धरि तहँ कीन्ह निवास ।
सादर सुनि रघुपति गुन, पुनि आयउँ कैलास ॥
taba kachu kāla marāla tanu, dhari taham̐ kīnha nivāsa |
sādara suni raghupati guna, puni āyaum̐ kailāsa ||
पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0