उत्तरकाण्ड

अध्याय 56: शिव का विरह और नील पर्वत

6 श्लोक · 56 में से 130

इस अध्याय में क्या होता है

शिव का विरह और नील पर्वत

भगवान शिव उमा को बताते हैं कि यह भव-मोचनी कथा उन्होंने पहले कैसे सुनी। पिछले जन्म में तुम दक्ष के घर सती नाम से प्रकट हुई थीं। दक्ष के यज्ञ में अपमान होने पर तुमने अत्यन्त क्रोध में प्राण त्याग दिए, और मेरे गणों ने यज्ञ विध्वंस किया; वह सारा प्रसंग तुम जानती हो। तब तुम्हारे वियोग से मैं बहुत दुःखी हुआ और विरक्त होकर सुन्दर वन, पर्वत, नदियाँ और सरोवर देखता फिरा। सुमेरु के उत्तर में दूर एक सुन्दर नील पर्वत है, जिसके चार सोने के शिखर मुझे भाए। हर शिखर पर एक विशाल वृक्ष है: बरगद, पीपल, पाकड़ और आम। पर्वत के ऊपर मणि-सीढ़ियों वाला सुन्दर सरोवर है; उसका जल शीतल, निर्मल और मधुर है, रंग-बिरंगे कमल खिले हैं, हंस मधुर कूजते हैं और भौंरे गुंजार करते हैं।

56.1

मैं जिमि कथा सुनी भव मोचनि । सो प्रसङ्ग सुनु सुमुखि सुलोचनि ॥
प्रथम दच्छ गृह तव अवतारा । सती नाम तब रहा तुम्हारा ॥

maiṃ jimi kathā sunī bhava mocani | so prasaṅga sunu sumukhi sulocani ||
prathama daccha gṛha tava avatārā | satī nāma taba rahā tumhārā ||

56.2

दच्छ जज्ञ तव भा अपमाना । तुम्ह अति क्रोध तजे तब प्राना ॥
मम अनुचरन्ह कीन्ह मख भङ्गा । जानहु तुम्ह सो सकल प्रसङ्गा ॥

daccha jajña tava bhā apamānā | tumha ati krodha taje taba prānā ||
mama anucaranha kīnha makha bhaṅgā | jānahu tumha so sakala prasaṅgā ||

56.3

तब अति सोच भयउ सन मोरें । दुखी भयउँ बियोग प्रिय तोरें ॥
सुन्दर बन गिरि सरित तड़ागा । कौतुक देखत फिरउँ बेरागा ॥

taba ati soca bhayau sana moreṃ | dukhī bhayaum̐ biyoga priya toreṃ ||
sundara bana giri sarita tar̤āgā | kautuka dekhata phiraum̐ berāgā ||

56.4

गिरि सुमेरु उत्तर दिसि दूरी । नील सैल एक सुन्दर भूरी ॥
तासु कनक-मय सिखर सुहाये । चारि चारु मोरे मन भाये ॥

giri sumeru uttara disi dūrī | nīla saila eka sundara bhūrī ||
tāsu kanaka-maya sikhara suhāye | cāri cāru more mana bhāye ||

56.5

तिन्ह पर एक एक बिटप बिसाला । बट पीपर पाकरी रसाला ॥
सैलोपरि सर सुन्दर सोहा । मनि सोपान देखि मन मोहा ॥

tinha para eka eka biṭapa bisālā | baṭa pīpara pākarī rasālā ||
sailopari sara sundara sohā | mani sopāna dekhi mana mohā ||

दो॰ 56दोहा

सीतल अमल मधुर जल, जलज बिपुल बहु रङ्ग ।
कूजत कल रव हंस गन, गुञ्जत मजुंल भृङ्ग ॥

sītala amala madhura jala, jalaja bipula bahu raṅga |
kūjata kala rava haṃsa gana, guñjata majuṃla bhṛṅga ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0