उत्तरकाण्ड

अध्याय 55: गरुड़ कौए के पास क्यों गए

6 श्लोक · 55 में से 130

इस अध्याय में क्या होता है

गरुड़ कौए के पास क्यों गए

उमा अपना प्रश्न आगे रखती हैं। हे कृपालु, यह पवित्र और सुन्दर प्रभु-चरित कौए ने कहाँ पाया, और हे कामदेव के शत्रु, आपने इसे कैसे सुना? मुझे बड़ा कौतूहल है। गरुड़ महाज्ञानी हैं, गुणों की राशि, हरि के सेवक और उनके अत्यन्त निकट रहने वाले। उन्होंने मुनियों के समूह को छोड़कर कौए के पास जाकर कथा क्यों सुनी? दोनों हरि-भक्तों, काग और गरुड़, का संवाद कैसे हुआ? गौरी की सरल वाणी सुनकर भगवान शिव प्रसन्न होकर बोले: हे सती, तुम धन्य हो, तुम्हारी बुद्धि पवित्र है और रघुपति के चरणों में तुम्हारी प्रीति थोड़ी नहीं। वह परम पवित्र इतिहास सुनो, जिसे सुनकर शोक और भ्रम मिटते हैं और राम-चरणों में विश्वास जागता है। ऐसा ही प्रश्न पक्षिराज ने कौए से किया था; वह सब मैं आदर से कहूँगा।

55.1

यह प्रभु चरित पवित्र सुहावा । कहहु कृपाल काग कहँ पावा ॥
तुम्ह केहि भाँति सुना मदनारी । कहहु मोहि अति कौतुक भारी ॥

yaha prabhu carita pavitra suhāvā | kahahu kṛpāla kāga kaham̐ pāvā ||
tumha kehi bhām̐ti sunā madanārī | kahahu mohi ati kautuka bhārī ||

55.2

गरुड़ महाग्यानी गुन रासी । हरि सेवक अति निकट निवासी ॥
तेहिं केहि हेतु काग सन जाई । सुनी कथा मुनि निकर बिहाई ॥

garur̤a mahāgyānī guna rāsī | hari sevaka ati nikaṭa nivāsī ||
tehiṃ kehi hetu kāga sana jāī | sunī kathā muni nikara bihāī ||

55.3

कहहु कवन बिधि भा सम्बादा । दोउ हरिभगत काग उरगादा ॥
गौरि गिरा सुनि सरल सुहाई । बोले सिव सादर सुख पाई ॥

kahahu kavana bidhi bhā sambādā | dou haribhagata kāga uragādā ||
gauri girā suni sarala suhāī | bole siva sādara sukha pāī ||

55.4

धन्य सती पावनि मति तोरी । रघुपति-चरन प्रीति नहिँ थोरी ॥
सुनहु परम पुनीत इतिहासा । जो सुनि सकल सोक भ्रम नासा ॥

dhanya satī pāvani mati torī | raghupati-carana prīti nahim̐ thorī ||
sunahu parama punīta itihāsā | jo suni sakala soka bhrama nāsā ||

55.5

उपजइ राम चरन बिस्वासा । भव निधि तर नर बिनहिं प्रयासा ॥

upajai rāma carana bisvāsā | bhava nidhi tara nara binahiṃ prayāsā ||

दो॰ 55दोहा

दो ऐसिअ प्रस्न बिहंगपति कीन्ह काग सन जाइ ।
सो सम सादर कहिहउँ, सुनहु उमा मन लाइ ॥

do aisia prasna bihaṃgapati kīnha kāga sana jāi |
so sama sādara kahihaum̐, sunahu umā mana lāi ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0