उत्तरकाण्ड

अध्याय 52: शिव की कथा-समाप्ति, उमा का हर्ष

7 श्लोक · 52 में से 130

इस अध्याय में क्या होता है

शिव की कथा-समाप्ति, उमा का हर्ष

भगवान शिव गिरिजा से कथा के विषय में कहते हैं। अपनी बुद्धि भर मैंने यह कथा कही, पर श्रीराम के चरित सौ करोड़ हैं; श्रुति और शारदा भी उनका पार नहीं पातीं। राम अनन्त हैं, उनके गुण, जन्म, कर्म और नाम भी अनन्त हैं। जल की बूँदें और धरती के रज-कण गिने जा सकते हैं, रघुपति के चरित नहीं चुकते। यह कथा सुनने से अटल भक्ति होती है। शिव कहते हैं, जो कथा भुशुण्डि ने गरुड़ को सुनाई थी, वह सब मैंने तुमसे कही; अब और क्या कहूँ? उमा विनम्र वाणी में बोलीं: हे त्रिपुरारि, मैं धन्य हूँ। आपकी कृपा से मोह मिट गया, राम का प्रताप जान लिया। आपके मुख से कथा-अमृत झरता है, कान पीते हैं पर तृप्त नहीं होते।

52.1

गिरिजा सुनहु बिसद यह कथा । मैं सब कही मोरि मति जथा ॥
राम चरित सत कोटि अपारा । श्रुति सारदा न बरनइ पारा ॥

girijā sunahu bisada yaha kathā | maiṃ saba kahī mori mati jathā ||
rāma carita sata koṭi apārā | śruti sāradā na baranai pārā ||

52.2

राम अनन्त अनन्त गुनानी । जनम करम अनन्त नामानी ॥
जल सीकर महि रज गनि जाहीं । रघुपति चरित न बरनि सिराहीं ॥

rāma ananta ananta gunānī | janama karama ananta nāmānī ||
jala sīkara mahi raja gani jāhīṃ | raghupati carita na barani sirāhīṃ ||

52.3

बिमल कथा हरि-पद-दायनी । भगति होइ सुनि अनपायनी ॥
उमा कहिउँ सब कथा सुहाई । जो भुसुंडि खगपतिहि सुनाई ॥

bimala kathā hari-pada-dāyanī | bhagati hoi suni anapāyanī ||
umā kahium̐ saba kathā suhāī | jo bhusuṃḍi khagapatihi sunāī ||

52.4

कछुक राम गुन कहेउँ बखानी । अब का कहउँ से कहहु भवानी ॥
सुनि सुभ कथा उमा हरषानी । बोली अति बिनीत मृदु-बानी ॥

kachuka rāma guna kaheum̐ bakhānī | aba kā kahaum̐ se kahahu bhavānī ||
suni subha kathā umā haraṣānī | bolī ati binīta mṛdu-bānī ||

52.5

धन्य धन्य मैं धन्य पुरारी । सुनेउँ राम गुन भव-भय हारी ॥

dhanya dhanya maiṃ dhanya purārī | suneum̐ rāma guna bhava-bhaya hārī ||

दो॰ 52 (क)दोहा

तुम्हरी कृपाँ कृपायतन, अब कृतकृत्य न मोह ।
जानेउँ राम प्रताप, प्रभु चिदानन्द सन्दोह ॥

tumharī kṛpām̐ kṛpāyatana, aba kṛtakṛtya na moha |
jāneum̐ rāma pratāpa, prabhu cidānanda sandoha ||

दो॰ 52 (ख)दोहा

नाथ तवानन ससि स्रवत, कथा सुधा रघुबीर ।
श्रवन पुटन्हि बन पान करि, नहिँ अघात मति-धीरं ॥

nātha tavānana sasi sravata, kathā sudhā raghubīra |
śravana puṭanhi bana pāna kari, nahim̐ aghāta mati-dhīraṃ ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0