उत्तरकाण्ड

अध्याय 50: अमराई में श्रीराम, पंखा झलते हनुमान

6 श्लोक · 50 में से 130

इस अध्याय में क्या होता है

अमराई में श्रीराम, पंखा झलते हनुमान

यह कहकर मुनि वसिष्ठ घर लौटे; उनके वचन कृपासिन्धु को बहुत भाए। फिर श्रीराम हनुमान, भरत और भाइयों को साथ लेकर नगर के बाहर गए। हाथी, रथ और घोड़े मँगवाए, सबकी सराहना की, और जिसने जो चाहा उसे वही दिया। सबका श्रम हरने वाले प्रभु स्वयं थककर शीतल अमराई में गए। भरत ने अपना वस्त्र बिछाया, प्रभु बैठे और सब भाई सेवा करने लगे। पवनपुत्र पंखा झलने लगे; शरीर पुलकित, नेत्रों में जल। भगवान शिव गिरिजा से कहते हैं, हनुमान के समान बड़भागी और राम-चरणों का अनुरागी कोई नहीं; प्रभु ने उनकी सेवा को बार-बार अपने मुख से सराहा है। उसी समय वीणा लिए नारद आए और श्रीराम की नित्य-नवीन कीर्ति गाने लगे।

50.1

अस कहि मुनि बसिष्ठ गृह आये । कृपासिन्धु के मन अति भाये ॥
हनूमान भरतादिक भ्राता । सङ्ग लिये सेवक सुखदाता ॥

asa kahi muni basiṣṭha gṛha āye | kṛpāsindhu ke mana ati bhāye ||
hanūmāna bharatādika bhrātā | saṅga liye sevaka sukhadātā ||

50.2

पुनि कृपाल पुर बाहेर गये । गज रथ तुरग मगावत भये ॥
देखि कृपा करि सकल सराहे । दिये उचित जिन्ह जिन्ह तेइ चाहे ॥

puni kṛpāla pura bāhera gaye | gaja ratha turaga magāvata bhaye ||
dekhi kṛpā kari sakala sarāhe | diye ucita jinha jinha tei cāhe ||

50.3

हरन सकल श्रम प्रभु श्रम पाई । गये जहाँ सीतल अवँराई ॥
भरत दीन्ह निज बसन डसाई । बैठे प्रभु सेवहिं सब भाई ॥

harana sakala śrama prabhu śrama pāī | gaye jahām̐ sītala avam̐rāī ||
bharata dīnha nija basana ḍasāī | baiṭhe prabhu sevahiṃ saba bhāī ||

50.4

मारुतसुत तब मारुत करई । पुलक बपुष लोचन जल भरई ॥
हनूमान समान बड़-बड़भागी । नहिँ कोउ राम-चरन अनुरागी ॥

mārutasuta taba māruta karaī | pulaka bapuṣa locana jala bharaī ||
hanūmāna samāna bar̤a-bar̤abhāgī | nahim̐ kou rāma-carana anurāgī ||

50.5

गिरिजा जासु प्रीति सेवकाई । बार बार प्रभु निज मुख गाई ॥

girijā jāsu prīti sevakāī | bāra bāra prabhu nija mukha gāī ||

दो॰ 50दोहा

तेहिं, अवसर मुनि नारद, आये करतल बीन ।
गावन लगे राम कल, कीरति सदा नबीन ॥

tehiṃ, avasara muni nārada, āye karatala bīna |
gāvana lage rāma kala, kīrati sadā nabīna ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0