उत्तरकाण्ड

अध्याय 49: वसिष्ठ का एक वरदान माँगना

5 श्लोक · 49 में से 130

इस अध्याय में क्या होता है

वसिष्ठ का एक वरदान माँगना

वसिष्ठ श्रीराम से आगे कहते हैं: जप, तप, नियम, योग, अपना धर्म, श्रुति से उपजे अनेक शुभ कर्म, ज्ञान, दया, इन्द्रिय-निग्रह, तीर्थ-स्नान, वेद और सज्जन जितने धर्म बताते हैं, और अनेक आगम, निगम, पुराण पढ़ने-सुनने का फल, हे प्रभु, एक ही है: आपके चरण-कमलों में निरन्तर प्रीति। क्या मैल को मैल से धोने पर मैल छूटता है? क्या जल मथने से किसी को घी मिलता है? हे रघुराई, प्रेम-भक्ति के जल बिना भीतर का मैल कभी नहीं जाता। वही सर्वज्ञ है, वही तत्त्वज्ञ और पण्डित, वही गुणों का घर और अखण्ड विज्ञान वाला, वही चतुर और सब शुभ लक्षणों से युक्त, जिसकी आपके चरण-कमलों में प्रीति है। अन्त में मुनि एक वर माँगते हैं: जन्म-जन्मान्तर में प्रभु के चरण-कमलों में मेरा स्नेह कभी न घटे।

49.1

जप तप नियम जोग निज धर्मा । श्रुति सम्भव नाना सुभ कर्मा ॥
ज्ञान दया दम तीरथ-मज्जन । जहँ लगि धरम कहत श्रुति सज्जन ॥

japa tapa niyama joga nija dharmā | śruti sambhava nānā subha karmā ||
jñāna dayā dama tīratha-majjana | jaham̐ lagi dharama kahata śruti sajjana ||

49.2

आगम निगम पुरान अनेका । पढ़े सुने कर फल प्रभु एका ॥
तब पद पङ्कज प्रीति निरन्तर । सब साधन कर यह फल सुन्दर ॥

āgama nigama purāna anekā | par̤he sune kara phala prabhu ekā ||
taba pada paṅkaja prīti nirantara | saba sādhana kara yaha phala sundara ||

49.3

छूटइ मल कि मलहि के धोये । घृत कि पाव कोउ बारि बिलोये ॥
प्रेम-भगति जल बिनु रघुराई । अभिअन्तर मल कबहुँ न जाई ॥

chūṭai mala ki malahi ke dhoye | ghṛta ki pāva kou bāri biloye ||
prema-bhagati jala binu raghurāī | abhiantara mala kabahum̐ na jāī ||

49.4

सोइ सर्बग्य तज्ञ सोइ पंडित । सोइ गुन गृह विज्ञान अखंडित ॥
दच्छ सकल लच्छन जुत सोई । जाकें पद-सरोज रति होई ॥

soi sarbagya tajña soi paṃḍita | soi guna gṛha vijñāna akhaṃḍita ||
daccha sakala lacchana juta soī | jākeṃ pada-saroja rati hoī ||

दो॰ 49दोहा

नाथ एक बर मागउँ, राम कृपा करि देहु ।
जनम जनम प्रभु पद-कमल, कबहुँ घटै जनि नेहु ॥

nātha eka bara māgaum̐, rāma kṛpā kari dehu |
janama janama prabhu pada-kamala, kabahum̐ ghaṭai jani nehu ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0