उत्तरकाण्ड

अध्याय 5: श्रीराम और भरत का मिलन

7 श्लोक · 5 में से 130

इस अध्याय में क्या होता है

श्रीराम और भरत का मिलन

वामदेव और वसिष्ठ को देखकर प्रभु धनुष भूमि पर रखकर दौड़ते हैं, गुरु के चरण पकड़ते हैं और ब्राह्मणों को प्रणाम करते हैं। भरत उन चरणों को पकड़ लेते हैं जिन्हें शिव और ब्रह्मा पूजते हैं, और भूमि पर पड़े रहते हैं, उठाने पर भी नहीं उठते। प्रभु उन्हें बलपूर्वक उठाकर हृदय से लगाते हैं, कमल-नयनों में जल भर आता है। तुलसीदास कहते हैं, मानो प्रेम और शृंगार शरीर धरकर मिले हों। भगवान शिव उमा से कहते हैं कि कुशल पूछने पर भरत से बोला न गया; मन ने कहा, अब कुशल है, डूबते हुए को प्रभु ने हाथ पकड़कर निकाल लिया। फिर प्रभु शत्रुघ्न से मिलते हैं, और लक्ष्मण भरत से।

5.1

आये भरत सङ्ग सब लोगा । कृस तन श्रीरघुबीर बियोगा ॥
बामदेव बसिष्ठ मुनिनायक । देखे प्रभु महि धरि धनु सायक ॥

āye bharata saṅga saba logā | kṛsa tana śrīraghubīra biyogā ||
bāmadeva basiṣṭha munināyaka | dekhe prabhu mahi dhari dhanu sāyaka ||

5.2

धाइ धरे गुर चरन-सरोरुह । अनुज सहित अति पुलक तनोरुह ॥
भेंटि कुसल बूझी मुनिराया । हमरें कुसल तुम्हारिहिं दाया ॥

dhāi dhare gura carana-saroruha | anuja sahita ati pulaka tanoruha ||
bheṃṭi kusala būjhī munirāyā | hamareṃ kusala tumhārihiṃ dāyā ||

5.3

सकल द्विजन्ह मिलि नायउ माथा । धरम धुरन्धर रघुकुल नाथा ॥
गहे भरत पुनि प्रभु-पद-पङ्कज । नमत जिन्हहि सुर मुनि सङ्कर अज ॥

sakala dvijanha mili nāyau māthā | dharama dhurandhara raghukula nāthā ||
gahe bharata puni prabhu-pada-paṅkaja | namata jinhahi sura muni saṅkara aja ||

5.4

परे भूमि नहिँ उठत उठाये । बर करि कृपासिन्धु उर लाये ॥
स्यामल गात रोम भये ठाढ़े । नव-राजीव-नयन जल बाढ़े ॥

pare bhūmi nahim̐ uṭhata uṭhāye | bara kari kṛpāsindhu ura lāye ||
syāmala gāta roma bhaye ṭhār̤he | nava-rājīva-nayana jala bār̤he ||

5.छं॰ 1छन्द

राजीव-लोचन स्त्रवत जल तन, ललित पुलकावलि बनी ।
अति प्रेम हृदयँ लगाइ अनुजहि, मिले प्रभु त्रिभुवन धनी ॥
प्रभु मिलत अनुजहि सोह मो पहिँ, जाति नहिँ उपमा कही ।
जनु प्रेम अरु सिङ्गार तनु धरि, मिले बर सुखमा लही ॥

rājīva-locana stravata jala tana, lalita pulakāvali banī |
ati prema hṛdayam̐ lagāi anujahi, mile prabhu tribhuvana dhanī ||
prabhu milata anujahi soha mo pahim̐, jāti nahim̐ upamā kahī |
janu prema aru siṅgāra tanu dhari, mile bara sukhamā lahī ||

5.छं॰ 2छन्द

बूझत कृपानिधि कुसल भरतहि, बचन बेगि न आवई ।
सुनु सिवा सो सुख बचन मन से, भिन्न जान जो पावई ॥
अब कुसल कौसलनाथ आरत जानि जन दरसन दियो ।
बूड़त बिरह बारीस कृपानिधान मोहि कर गहि लियो ॥

būjhata kṛpānidhi kusala bharatahi, bacana begi na āvaī |
sunu sivā so sukha bacana mana se, bhinna jāna jo pāvaī ||
aba kusala kausalanātha ārata jāni jana darasana diyo |
būr̤ata biraha bārīsa kṛpānidhāna mohi kara gahi liyo ||

दो॰ 5दोहा

पुनि प्रभु हरषि सत्रुहन, भेँटे हृदयँ लगाइ ।
लछिमन भरत मिले तम, परम प्रेम दोउ भाइ ॥

puni prabhu haraṣi satruhana, bhem̐ṭe hṛdayam̐ lagāi |
lachimana bharata mile tama, parama prema dou bhāi ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0