उत्तरकाण्ड

अध्याय 45: भक्ति सुगम मार्ग, सत्संग से प्राप्त

5 श्लोक · 45 में से 130

इस अध्याय में क्या होता है

भक्ति सुगम मार्ग, सत्संग से प्राप्त

श्रीराम पुरवासियों से कहते हैं कि यदि इस लोक और परलोक दोनों में सुख चाहिए तो मेरे वचन हृदय में दृढ़ता से धारण करो। मेरी भक्ति सरल और सुखद मार्ग है, जिसे वेद और पुराण गाते हैं। ज्ञान अगम है, उसमें विघ्न अनेक हैं, साधन कठिन हैं और मन को कोई आधार नहीं मिलता; बहुत कष्ट सहकर कोई उसे पा भी ले, तो भक्ति के बिना वह मुझे प्रिय नहीं। भक्ति स्वतन्त्र है और सब सुखों की खान, पर सत्संग के बिना नहीं मिलती, और सन्त पुण्य-पुंज से ही मिलते हैं। संसार में एक ही बड़ा पुण्य है: मन, कर्म और वचन से निष्कपट ब्राह्मणों के चरणों की पूजा। फिर हाथ जोड़कर प्रभु एक गुप्त बात कहते हैं: शंकर के भजन बिना मेरी भक्ति नहीं मिलती।

45.1

जौं परलोक इहाँ सुख चहहू । सुनि मम बचन ह्रृदयँ दृढ़ गहहू ॥
सुलभ सुखद मारग यह भाई । भगति मोरि पुरान श्रुति गाई ॥

jauṃ paraloka ihām̐ sukha cahahū | suni mama bacana hrṛdayam̐ dṛr̤ha gahahū ||
sulabha sukhada māraga yaha bhāī | bhagati mori purāna śruti gāī ||

45.2

ग्यान अगम प्रत्यूह अनेका । साधन कठिन न बन कह टेका ॥
करत कष्ट बहु पावइ कोऊ । भगति हीन मोहि प्रिय नहिँ सोऊ ॥

gyāna agama pratyūha anekā | sādhana kaṭhina na bana kaha ṭekā ||
karata kaṣṭa bahu pāvai koū | bhagati hīna mohi priya nahim̐ soū ||

45.3

भगति सुतन्त्र सकल सुख खानी । बिनु सतसङ्ग न पावहिँ प्रानी ॥
पुन्य पुञ्ज बिनु मिलहिँ न सन्ता । सतसङ्गति संसृति कर अन्ता ॥

bhagati sutantra sakala sukha khānī | binu satasaṅga na pāvahim̐ prānī ||
punya puñja binu milahim̐ na santā | satasaṅgati saṃsṛti kara antā ||

45.4

पुन्य एक जग महँ नहिँ दूजा । मन क्रम बचन बिप्र पद पूजा ॥
सानुकूल तेहि पर मुनि देवा । जो तजि कपट करइ द्विज सेवा ॥

punya eka jaga maham̐ nahim̐ dūjā | mana krama bacana bipra pada pūjā ||
sānukūla tehi para muni devā | jo taji kapaṭa karai dvija sevā ||

दो॰ 45दोहा

औरउ एक गुपुत-मत, सबहि कहउँ कर जोरि ।
सङ्कर भजन बिना नर, भगति न पावइ मोरि ॥

aurau eka guputa-mata, sabahi kahaum̐ kara jori |
saṅkara bhajana binā nara, bhagati na pāvai mori ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0