उत्तरकाण्ड

अध्याय 44: मनुष्य देह भवसागर की नौका

5 श्लोक · 44 में से 130

इस अध्याय में क्या होता है

मनुष्य देह भवसागर की नौका

श्रीराम अयोध्यावासियों को उपदेश देते चलते हैं। इस देह का फल विषय-भोग नहीं है, वे कहते हैं; स्वर्ग भी थोड़ा है और अन्त में दुःख देता है। जो मनुष्य-तन पाकर मन विषयों में लगाता है, वह अमृत छोड़कर विष लेता है, मानो पारस मणि गँवाकर घुँघची उठा ले। अविनाशी जीव माया, काल, कर्म, स्वभाव और गुणों से घिरा चौरासी लाख योनियों में भटकता है, तब कभी ईश्वर बिना कारण स्नेह से नर-देह देते हैं। यह देह भवसागर का बेड़ा है। प्रभु की कृपा अनुकूल पवन है और सद्गुरु कर्णधार। ऐसा दुर्लभ साज पाकर भी जो पार नहीं उतरता, वह कृतघ्न और मन्दबुद्धि है, आत्मघाती की गति पाता है।

44.1

एहि तन कर फल विषय न भाई । स्वर्गउ स्वल्प अन्त दुखदाई ॥
नर तनु पाइ बिषयँ मन देहीं । पलटि सुधा ते सठ बिष लेहीं ॥

ehi tana kara phala viṣaya na bhāī | svargau svalpa anta dukhadāī ||
nara tanu pāi biṣayam̐ mana dehīṃ | palaṭi sudhā te saṭha biṣa lehīṃ ||

44.2

ताहि कबहुँ भल कहइ न कोई । गुञ्जा ग्रहइ परस मनि खोई ॥
आकर चारि लच्छ चौरासी । जोनि भ्रमत यह जिव अबिनासी ॥

tāhi kabahum̐ bhala kahai na koī | guñjā grahai parasa mani khoī ||
ākara cāri laccha caurāsī | joni bhramata yaha jiva abināsī ||

44.3

फिरत सदा माया कर प्रेरा । काल कर्म सुभाव गुन घेरा ॥
कबहुँक करि करुना नर-देही । देत ईस बिनु हेतु सनेही ॥

phirata sadā māyā kara prerā | kāla karma subhāva guna gherā ||
kabahum̐ka kari karunā nara-dehī | deta īsa binu hetu sanehī ||

44.4

नर तनु भव बारिधि कहुँ बेरो । सन्मुख मरुत अनुग्रह मेरो ॥
करनधार सदगुरु दृढ़ नावा । दुर्लभ साज सुलभ करि पावा ॥

nara tanu bhava bāridhi kahum̐ bero | sanmukha maruta anugraha mero ||
karanadhāra sadaguru dṛr̤ha nāvā | durlabha sāja sulabha kari pāvā ||

दो॰ 44दोहा

जो न तरै भव-सागर, नर समाज अस पाइ ।
सो कृत निन्दक, मन्दमति-आत्माहन गति जाइ ॥

jo na tarai bhava-sāgara, nara samāja asa pāi |
so kṛta nindaka, mandamati-ātmāhana gati jāi ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0