श्रीराम अयोध्यावासियों को उपदेश देते चलते हैं। इस देह का फल विषय-भोग नहीं है, वे कहते हैं; स्वर्ग भी थोड़ा है और अन्त में दुःख देता है। जो मनुष्य-तन पाकर मन विषयों में लगाता है, वह अमृत छोड़कर विष लेता है, मानो पारस मणि गँवाकर घुँघची उठा ले। अविनाशी जीव माया, काल, कर्म, स्वभाव और गुणों से घिरा चौरासी लाख योनियों में भटकता है, तब कभी ईश्वर बिना कारण स्नेह से नर-देह देते हैं। यह देह भवसागर का बेड़ा है। प्रभु की कृपा अनुकूल पवन है और सद्गुरु कर्णधार। ऐसा दुर्लभ साज पाकर भी जो पार नहीं उतरता, वह कृतघ्न और मन्दबुद्धि है, आत्मघाती की गति पाता है।