कहहु भगति पथ कवन प्रयासा । जोग न मख जप तप उपवासा ॥
सरल सुभाव न मन कुटिलाई । जथा लाभ सन्तोष सदाई ॥
kahahu bhagati patha kavana prayāsā | joga na makha japa tapa upavāsā ||
sarala subhāva na mana kuṭilāī | jathā lābha santoṣa sadāī ||
5 श्लोक · 46 में से 130
श्रीराम कहते हैं, भक्ति-पथ में क्या परिश्रम है? न योग, न यज्ञ, न जप, तप या उपवास। बस सरल स्वभाव, मन में कुटिलता नहीं, और जो मिले उसी में सन्तोष। जो मेरा दास कहलाकर भी मनुष्यों की आशा करे, उसका विश्वास कैसा? मैं इसी आचरण के वश हूँ। ऐसे भक्त का किसी से वैर नहीं, न आशा न भय। वह स्वार्थ के आरम्भ नहीं करता, उसका कोई घर नहीं, मान नहीं चाहता; वह निष्पाप, क्रोधरहित और विज्ञानी है। सज्जनों का संग उसे प्रिय है, और विषय, स्वर्ग तथा मोक्ष तिनके समान। जो मेरे गुण और नाम में रत है, ममता, मद और मोह से छूटा है, उसका परमानन्द वही जानता है।
कहहु भगति पथ कवन प्रयासा । जोग न मख जप तप उपवासा ॥
सरल सुभाव न मन कुटिलाई । जथा लाभ सन्तोष सदाई ॥
kahahu bhagati patha kavana prayāsā | joga na makha japa tapa upavāsā ||
sarala subhāva na mana kuṭilāī | jathā lābha santoṣa sadāī ||
भार दास कहाइ नर आसा । करइ तौ कहहु कहा बिस्वासा ॥
बहुत कहउँ का कथा बढ़ाई । एहि आचरन बस्य मैं भाई ॥
bhāra dāsa kahāi nara āsā | karai tau kahahu kahā bisvāsā ||
bahuta kahaum̐ kā kathā bar̤hāī | ehi ācarana basya maiṃ bhāī ||
बयर न बिग्रह आस न त्रासा । सुखमय ताहि सदा सब आसा ॥
अनारंभ अनिकेत अमानी । अनघ अरोष दच्छ विज्ञानी ॥
bayara na bigraha āsa na trāsā | sukhamaya tāhi sadā saba āsā ||
anāraṃbha aniketa amānī | anagha aroṣa daccha vijñānī ||
प्रीति सदा सज्जन संसर्गा । तृन सम विषय स्वर्ग अपवर्गा ॥
भगति पच्छ हठ नहिँ सठताई । दुष्ट तर्क सब दूरि बहाई ॥
prīti sadā sajjana saṃsargā | tṛna sama viṣaya svarga apavargā ||
bhagati paccha haṭha nahim̐ saṭhatāī | duṣṭa tarka saba dūri bahāī ||
मम गुन-ग्राम नाम रत, गत ममता मद मोह ।
ता कर सुख सोइ जानइ, परानंद-सन्दोह ॥
mama guna-grāma nāma rata, gata mamatā mada moha |
tā kara sukha soi jānai, parānaṃda-sandoha ||
पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0