सनकादिक विधि लोक सिधाए । भ्रातन्ह राम-चरन सिर नाए ॥
पूछत प्रभुहि सकल सकुचाहीं । चितवहिँ सब मारुत-सुत पाहीं ॥
sanakādika vidhi loka sidhāe | bhrātanha rāma-carana sira nāe ||
pūchata prabhuhi sakala sakucāhīṃ | citavahim̐ saba māruta-suta pāhīṃ ||
5 श्लोक · 36 में से 130
सनकादि ब्रह्मलोक चले जाते हैं, और भाई श्रीराम के चरणों में सिर नवाते हैं। सब प्रभु से कुछ पूछना चाहते हैं पर सकुचाते हैं, और हनुमान की ओर देखते हैं। वे प्रभु के मुख से वह वाणी सुनना चाहते हैं जिससे सब भ्रम मिट जाए। अन्तर्यामी प्रभु सब जान लेते हैं और पूछते हैं, हनुमान, क्या बात है? हनुमान हाथ जोड़कर कहते हैं: हे दीनदयाल भगवान, भरत कुछ पूछना चाहते हैं, पर प्रश्न करते मन में सकुचाते हैं। प्रभु कहते हैं, हनुमान, तुम मेरा स्वभाव जानते हो; क्या भरत और मुझमें कभी कोई अन्तर रहा है? यह सुनकर भरत चरण पकड़ लेते हैं। हे शरणागत के दुःख हरने वाले नाथ, मुझे कोई सन्देह नहीं, सपने में भी मोह नहीं। यह केवल आपकी कृपा है, हे कृपा और आनन्द के सागर।
सनकादिक विधि लोक सिधाए । भ्रातन्ह राम-चरन सिर नाए ॥
पूछत प्रभुहि सकल सकुचाहीं । चितवहिँ सब मारुत-सुत पाहीं ॥
sanakādika vidhi loka sidhāe | bhrātanha rāma-carana sira nāe ||
pūchata prabhuhi sakala sakucāhīṃ | citavahim̐ saba māruta-suta pāhīṃ ||
सुनि चहहिँ प्रभु मुख कै बानी । जो सुनि होइ सकल भ्रम हानी ॥
अन्तरजामी प्रभु सब जाना । बूझत कहहु काह हनुमाना ॥
suni cahahim̐ prabhu mukha kai bānī | jo suni hoi sakala bhrama hānī ||
antarajāmī prabhu saba jānā | būjhata kahahu kāha hanumānā ||
जोरि पानि कह तब हनुमन्ता । सुनहु दीनदयाल भगवन्ता ॥
नाथ भरत कछु पूछन चहहीँ । प्रस्न करत मन सकुचत अहहीँ ॥
jori pāni kaha taba hanumantā | sunahu dīnadayāla bhagavantā ||
nātha bharata kachu pūchana cahahīm̐ | prasna karata mana sakucata ahahīm̐ ||
तुम्ह जानहु कपि मोर सुभाऊ । भरतहि मोहि कछु अन्तर काऊ ॥
सुनि प्रभु बचन भरत गहे चरना । सुनहु नाथ प्रनतारति हरना ॥
tumha jānahu kapi mora subhāū | bharatahi mohi kachu antara kāū ||
suni prabhu bacana bharata gahe caranā | sunahu nātha pranatārati haranā ||
नाथ न मोहि सन्देह कछु, सपनेहुँ लोक न मोह ।
केवल कृपा तुम्हारिहि, कृपानन्द-सन्दोह ॥
nātha na mohi sandeha kachu, sapanehum̐ loka na moha |
kevala kṛpā tumhārihi, kṛpānanda-sandoha ||
पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0