उत्तरकाण्ड

अध्याय 35: मुनियों का भक्ति-वर माँगना

6 श्लोक · 35 में से 130

इस अध्याय में क्या होता है

मुनियों का भक्ति-वर माँगना

मुनि आगे कहते हैं: हे रघुपति, अपनी पावन भक्ति दीजिए, जो तीनों तापों को मिटाती है। आप शरणागत के लिए कामधेनु और कल्पवृक्ष हैं; यह वर दीजिए। आप भवसागर को सोखने वाले अगस्त्य हैं, सेवकों को सुलभ। हे दीनबन्धु, मन से उपजे दुःखों को काटिए और समता फैलाइए। आप आशा, भय और ईर्ष्या मिटाने वाले, विनय और वैराग्य बढ़ाने वाले हैं। हमें संसार-नदी पार कराने वाली भक्ति रूपी नाव दीजिए। आप मुनियों के मन रूपी मानसरोवर के हंस हैं, ब्रह्मा और शंकर आपके चरण पूजते हैं, आप तुलसीदास के प्रभु हैं। बार-बार स्तुति और प्रणाम करके सनकादि मनचाहा वर पाकर ब्रह्मलोक जाते हैं।

35.1

देहु भगति रघुपति अति पावनि । त्रिबिध ताप भव-दाप नसावनि ॥
प्रनत काम सुरधेनु कलपतरु । होइ प्रसन्न दीजै मनु यह बरु ॥

dehu bhagati raghupati ati pāvani | tribidha tāpa bhava-dāpa nasāvani ||
pranata kāma suradhenu kalapataru | hoi prasanna dījai manu yaha baru ||

35.2

भव बारिधि कुम्भज रघुनायक । सेवक सुलभ सकल सुख दायक ॥
मन सम्भव दारुन दुख दारय । दीनबन्धु समता विस्तारय ॥

bhava bāridhi kumbhaja raghunāyaka | sevaka sulabha sakala sukha dāyaka ||
mana sambhava dāruna dukha dāraya | dīnabandhu samatā vistāraya ||

35.3

आस त्रास इरिषादि निवारक । बिनय बिबेक बिरति बिस्तारक ॥
भूप-मौलि मन मंडन धरनी । देहि भगति संसृति-सरि तरनी ॥

āsa trāsa iriṣādi nivāraka | binaya bibeka birati bistāraka ||
bhūpa-mauli mana maṃḍana dharanī | dehi bhagati saṃsṛti-sari taranī ||

35.4

मुनि मन मानस हंस निरन्तर । चरन-कमल बन्दित अज सङ्कर ॥
रघुकुल केतु सेतु श्रुति रच्छक । काल करम सुभाव गुन भच्छक ॥

muni mana mānasa haṃsa nirantara | carana-kamala bandita aja saṅkara ||
raghukula ketu setu śruti racchaka | kāla karama subhāva guna bhacchaka ||

35.5

तारन तरन हरन सब दूषन । तुलसिदास प्रभु त्रिभुवन भूषन ॥

tārana tarana harana saba dūṣana | tulasidāsa prabhu tribhuvana bhūṣana ||

दो॰ 35दोहा

हो-बार बार अस्तुति करि, प्रेम सहित सिर नाइ ।
ब्रह्म-भवन सनकादि मे, अति अभीष्ट बर पाई ॥

ho-bāra bāra astuti kari, prema sahita sira nāi |
brahma-bhavana sanakādi me, ati abhīṣṭa bara pāī ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0