इस अध्याय में क्या होता है नगरवासी एक-दूसरे को भजन सिखाते हैं जहाँ-तहाँ लोग रघुपति के गुण गाते और एक-दूसरे को सिखाते हैं: शरणागत के रक्षक श्रीराम को भजो। वे कमल-नयन और श्याम हैं, और जैसे पलकें आँखों की रक्षा करती हैं, वैसे सेवकों की करते हैं। वे सन्त रूपी कमलवन के सूर्य, काल रूपी सर्प के लिए गरुड़, लोभ-मोह रूपी हिरनों के शिकारी, काम रूपी हाथी के लिए सिंह और राक्षस रूपी वन के लिए अग्नि हैं। भवभय मिटाने वाले जानकी सहित रघुवीर को क्यों नहीं भजते? वे वासना रूपी मच्छरों के लिए पाला हैं, अजन्मा, अविनाशी, तुलसीदास के उदार प्रभु। इस प्रकार नगर गाता है, और कृपानिधान सब पर अनुकूल रहते हैं।
30.1 जहँ तहँ नर रघुपति गुन गावहिँ । बैठि परसपर इहइ सिखावहिँ ॥ भजहु प्रनत प्रतिपालक रामहि । सोभा सील रूप गुन धामहि ॥
jaham̐ taham̐ nara raghupati guna gāvahim̐ | baiṭhi parasapara ihai sikhāvahim̐ || bhajahu pranata pratipālaka rāmahi | sobhā sīla rūpa guna dhāmahi ||
30.2 जलज-बिलोचन स्यामल गातहि । पलक नयन इव सेवक त्रातहि ॥ धृत सर रुचिर चाप तूनीरहि । सन्त कञ्ज बन रवि रनधीरहि ॥
jalaja-bilocana syāmala gātahi | palaka nayana iva sevaka trātahi || dhṛta sara rucira cāpa tūnīrahi | santa kañja bana ravi ranadhīrahi ||
30.3 काल कराल ब्याल खगराजहि । नमत राम अकाम ममता जहि ॥ लोभ मोह मृग-जूथ किरातहि । मनसिज करि हरि जन सुखदातहि ॥
kāla karāla byāla khagarājahi | namata rāma akāma mamatā jahi || lobha moha mṛga-jūtha kirātahi | manasija kari hari jana sukhadātahi ||
30.4 संसय सोक निबिड़ तम भानुहि । दनुज गहन घन दहन कृशानुहि ॥ जनक-सुता समेत रघुबीरहि । कस न भजहु भञ्जन भव-भीरहि ॥
saṃsaya soka nibir̤a tama bhānuhi | danuja gahana ghana dahana kṛśānuhi || janaka-sutā sameta raghubīrahi | kasa na bhajahu bhañjana bhava-bhīrahi ||
30.5 बहु बासना मसक हिम-रासिहि । सदा एकरस अज अबिनासिहि ॥ मुनि रंजन भञ्जन महि भारहि । तुलसिदास के प्रभुहि उदारहि ॥
bahu bāsanā masaka hima-rāsihi | sadā ekarasa aja abināsihi || muni raṃjana bhañjana mahi bhārahi | tulasidāsa ke prabhuhi udārahi ||
दो॰ 30 दोहा एहि बिधि नगर नारि नर, करहिं राम गुन गान । सानुकूल सब पर रहहिँ, सन्तत कृपानिधान ॥
ehi bidhi nagara nāri nara, karahiṃ rāma guna gāna | sānukūla saba para rahahim̐, santata kṛpānidhāna ||
पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0
← उत्तरकाण्ड · अध्याय 29 अयोध्या के घाट, मन्दिर और उपवन उत्तरकाण्ड · अध्याय 31 → राम-प्रताप रूपी सूर्य का उदय