उत्तरकाण्ड

अध्याय 3: अयोध्या प्रभु के स्वागत को उमड़ती है

8 श्लोक · 3 में से 130

इस अध्याय में क्या होता है

अयोध्या प्रभु के स्वागत को उमड़ती है

भरत गुरु को और फिर राजमहल में समाचार देते हैं। माताएँ दौड़ती हैं और नर-नारी सब उमड़ पड़ते हैं। स्त्रियाँ सोने के थालों में दही, दूब, गोरोचन, फल, फूल और नई तुलसी भरकर गाती हुई चलती हैं। जो जैसा है वैसे ही दौड़ता है, बालकों और बूढ़ों को साथ लेने तक नहीं रुकता, और पूछता है, क्या तुमने दयालु रघुराज को देखा? नगरी शोभा की खान हो जाती है; शीतल, सुगन्धित पवन बहता है और सरयू निर्मल हो जाती है। भरत गुरु, परिवार और ब्राह्मणों के साथ आगे बढ़ते हैं। बहुत से लोग अटारियों पर चढ़कर आकाश में विमान देखते हैं, और नगर पूर्णिमा पर सागर की तरह उमड़ता है।

3.1

हरषि भरत कोसलपुर आये । समाचार सब गुरुहि सुनाये ॥
पुनि मन्दिर महँ बात जनाई । आवत नगर कुसल रघुराई ॥

haraṣi bharata kosalapura āye | samācāra saba guruhi sunāye ||
puni mandira maham̐ bāta janāī | āvata nagara kusala raghurāī ||

3.2

सुनत सकल जननीं उठि धाईँ । कहि प्रभु कुसल भरत समुझाई ॥
समाचार, पुरबासिन्ह पाये । नर अरु नारि हरषि सब धाये ॥

sunata sakala jananīṃ uṭhi dhāīm̐ | kahi prabhu kusala bharata samujhāī ||
samācāra, purabāsinha pāye | nara aru nāri haraṣi saba dhāye ||

3.3

दधि दुर्वा रोचन फल फूला । नव तुलसी दल मङ्गल-मूला ॥
भरि भरि हेम थार भामिनी । गावत चली सिन्धु-सिंधुरगामिनी ॥

dadhi durvā rocana phala phūlā | nava tulasī dala maṅgala-mūlā ||
bhari bhari hema thāra bhāminī | gāvata calī sindhu-siṃdhuragāminī ||

3.4

जो जैसेहिं तैसेहिं उठि धावहिं । बाल बृद्ध कहँ सङ्ग न लावहिँ ॥
एक एकन्ह कहँ बूझहिँ भाई । तुम्ह देखे दयाल रघुराई ॥

jo jaisehiṃ taisehiṃ uṭhi dhāvahiṃ | bāla bṛddha kaham̐ saṅga na lāvahim̐ ||
eka ekanha kaham̐ būjhahim̐ bhāī | tumha dekhe dayāla raghurāī ||

3.5

अवधपुरी प्रभु, आवत जानी । भई सकल सोभा कइ खानी ॥
बहइ सुहावन त्रिबिधि समीरा । भइ सरजू अति निर्मल नीरा ॥

avadhapurī prabhu, āvata jānī | bhaī sakala sobhā kai khānī ||
bahai suhāvana tribidhi samīrā | bhai sarajū ati nirmala nīrā ||

दो॰ 3 (क)दोहा

हरषित गुरु परिजन अनुज, भूसुर-बृन्द समेत ।
चले भरत मन प्रेम अति सन्मुख कृपानिकेत ॥

haraṣita guru parijana anuja, bhūsura-bṛnda sameta |
cale bharata mana prema ati sanmukha kṛpāniketa ||

दो॰ 3 (ख)दोहा

बहुतक चढ़ी अटारिन्ह, निरखहिँ गगन बिमान ।
देखि मधुर सुर हरषित, करहिं सुमङ्गल गान ॥

bahutaka car̤hī aṭārinha, nirakhahim̐ gagana bimāna |
dekhi madhura sura haraṣita, karahiṃ sumaṅgala gāna ||

दो॰ 3 (ग)दोहा

राका ससि रघुपति पुर, सिन्धु देखि हरषान ।
बढ़यो कोलाहल करत जनु, नारि तरङ्ग समान ॥

rākā sasi raghupati pura, sindhu dekhi haraṣāna |
bar̤hayo kolāhala karata janu, nāri taraṅga samāna ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0