उत्तरकाण्ड

अध्याय 2: हनुमान भरत को शुभ समाचार देते हैं

11 श्लोक · 2 में से 130

इस अध्याय में क्या होता है

हनुमान भरत को शुभ समाचार देते हैं

भरत को देखकर हनुमान पुलकित हो जाते हैं और अमृत जैसी वाणी बोलते हैं: जिनके विरह में आप दिन-रात सोचते हैं, वे युद्ध जीतकर सीता और अनुज सहित आ रहे हैं, और देवता उनका यश गा रहे हैं। भरत सब दुःख भूल जाते हैं, जैसे प्यासे को अमृत मिला हो। तुम कौन हो? मैं पवनपुत्र हनुमान, रघुपति का दास। भरत उन्हें हृदय से लगाते हैं। ऐसे सन्देश के समान संसार में कुछ नहीं, मैं यह ऋण नहीं चुका सकता। फिर सबसे बड़ा प्रश्न: क्या प्रभु कभी मुझे अपना दास जानकर याद करते हैं? हनुमान उनके चरणों पर गिर पड़ते हैं। आप श्रीराम को प्राणों जैसे प्रिय हैं, कहकर वे प्रभु के पास लौट जाते हैं।

2.1

देखत हनूमान अति हरषेउ । पुलक गात लोचन जल बरषेउ ॥
मन महँ बहुत भाँति सुख मानी । बोलेउ श्रवन सुधा सम बानी ॥

dekhata hanūmāna ati haraṣeu | pulaka gāta locana jala baraṣeu ||
mana maham̐ bahuta bhām̐ti sukha mānī | boleu śravana sudhā sama bānī ||

2.2

जासु बिरहँ सोचहु दिन राती । रटहु निरन्तर गुन गन पाँती ॥
रघुकुल तिलक सुजन सुख दाता । आयउ कुसल देव मुनि त्राता ॥

jāsu biraham̐ socahu dina rātī | raṭahu nirantara guna gana pām̐tī ||
raghukula tilaka sujana sukha dātā | āyau kusala deva muni trātā ||

2.3

रिपु रन जीति सुजस सुर गावत । सीता सहित अनुज प्रभु आवत ॥
सुनत बचन बिसरे सब दूखा । तृषावन्त जिमि पाइ पियूखा ॥

ripu rana jīti sujasa sura gāvata | sītā sahita anuja prabhu āvata ||
sunata bacana bisare saba dūkhā | tṛṣāvanta jimi pāi piyūkhā ||

2.4

को तुम्ह तात कहाँ से आये । मोहि परम प्रिय बचन सुनाये ॥
मारुत सुत मैं कपि हनुमाना । नाम मोर सुनु कृपानिधाना ॥

ko tumha tāta kahām̐ se āye | mohi parama priya bacana sunāye ||
māruta suta maiṃ kapi hanumānā | nāma mora sunu kṛpānidhānā ||

2.5

दीनबन्धु रघुपति कर किङ्कर । सुनत भरत भेंटेउ उठि सादर ॥
मिलत प्रेम नहिँ हृदयँ माता । नयन स्त्रवत जल पुलकित गाता ॥

dīnabandhu raghupati kara kiṅkara | sunata bharata bheṃṭeu uṭhi sādara ||
milata prema nahim̐ hṛdayam̐ mātā | nayana stravata jala pulakita gātā ||

2.6

कपि तव दरस सकल दुख बीते । मिले आजु मोहि राम पिरीते ॥
बार बार बूझी कुसलाता । तो कह देउँ काह सुनु भ्राता ॥

kapi tava darasa sakala dukha bīte | mile āju mohi rāma pirīte ||
bāra bāra būjhī kusalātā | to kaha deum̐ kāha sunu bhrātā ||

2.7

एहि सन्देस सरिस जग माहीं । करि बिचार देखेउँ कछु नाहीं ॥
नाहि न तात उरिन में तोही । अब प्रभु चरित सुनावहु मोही ॥

ehi sandesa sarisa jaga māhīṃ | kari bicāra dekheum̐ kachu nāhīṃ ||
nāhi na tāta urina meṃ tohī | aba prabhu carita sunāvahu mohī ||

2.8

तब हनुमन्त नाइ पद माथा । कहे सकल रघुपति गुन गाथा ॥
कहु कपि कबहुँ कृपाल गोसाईं । सुमिरहिं मोहि दास की नाँई ॥

taba hanumanta nāi pada māthā | kahe sakala raghupati guna gāthā ||
kahu kapi kabahum̐ kṛpāla gosāīṃ | sumirahiṃ mohi dāsa kī nām̐ī ||

2.छं॰ 1छन्द

निज दास ज्यों रघुबंसभूषन, कबहुँ मम सुमिरन कर्यो ।
सुनि भरत बचन बिनीत अति कपि, पुलकित तन चरनन्हि पर्यो ॥
रघुबीर निज मुख जासु गुन गन कहत अग जग नाथ जो ।
काहे न होइ बिनीत परम पुनीत सदगुन-सिन्धु सो ॥

nija dāsa jyoṃ raghubaṃsabhūṣana, kabahum̐ mama sumirana karyo |
suni bharata bacana binīta ati kapi, pulakita tana carananhi paryo ||
raghubīra nija mukha jāsu guna gana kahata aga jaga nātha jo |
kāhe na hoi binīta parama punīta sadaguna-sindhu so ||

दो॰ 2 (क)दोहा

राम प्रान प्रिय नाथ तुम्ह, सत्य बचन मम तात ।
पुनि पुनि मिलत भरत सुनि, हरष न हृदयँ समात ॥

rāma prāna priya nātha tumha, satya bacana mama tāta |
puni puni milata bharata suni, haraṣa na hṛdayam̐ samāta ||

2.सो॰ 2 (ख)सोरठा

भरत चरन सिर नाइ, तुरित गयउ कपि राम पहिँ ।
कही कुसल सब जाइ, हरषि चलेउ प्रभु जान चढ़ि ॥

bharata carana sira nāi, turita gayau kapi rāma pahim̐ |
kahī kusala saba jāi, haraṣi caleu prabhu jāna car̤hi ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0