इस अध्याय में क्या होता है अवधि का अन्तिम दिन और भरत काण्ड के आरम्भ में तीन संस्कृत श्लोक हैं, जिनमें पुष्पक पर विराजमान श्रीराम, सीता द्वारा सेवित उनके चरणकमल और भगवान शंकर की वन्दना है। फिर अयोध्या। अवधि में एक दिन शेष है और नगरवासी विरह से दुबले हो गए हैं। शुभ शकुन होते हैं; माताओं को लगता है अभी कोई प्रभु के आने की बात कहेगा; भरत की दाहिनी आँख और भुजा फड़कती है। फिर भी भरत डरते हैं। क्या प्रभु ने मुझे कपटी जानकर भुला दिया? बड़भागी तो लक्ष्मण थे जो साथ गए। अवधि बीतने पर भी प्राण रहे तो मुझसा अधम कोई नहीं। तभी हनुमान ब्राह्मण रूप में नाव की भाँति आते हैं और उन्हें कुशासन पर आँसू बहाते, राम-नाम जपते पाते हैं।
1.श्लो॰ 1 केकीकण्ठाभनीलं सुरवरविलसद्विप्रपादाब्जचिह्नं । शोभाढ्यं पीतवस्त्रं सरसिजनयनं सर्वदा सुप्रसन्नम् ॥ पाणौ नाराचचापं कपिनिकरयुतं बन्धुना सेव्यमानं । नौमीड्यं जानकीशं रघुवरमनिशं पुष्पकारूढरामम् ॥
kekīkaṇṭhābhanīlaṃ suravaravilasadviprapādābjacihnaṃ | śobhāḍhyaṃ pītavastraṃ sarasijanayanaṃ sarvadā suprasannam || pāṇau nārācacāpaṃ kapinikarayutaṃ bandhunā sevyamānaṃ | naumīḍyaṃ jānakīśaṃ raghuvaramaniśaṃ puṣpakārūḍharāmam ||
1.श्लो॰ 2 कोसलेन्द्रपदकञ्जमञ्जुलौ कोमलावजमहेशवन्दितौ । जानकीकरसरोजलालितौ चिन्तकस्य मनभृङ्गसड्गिनौ ॥
kosalendrapadakañjamañjulau komalāvajamaheśavanditau | jānakīkarasarojalālitau cintakasya manabhṛṅgasaḍginau ||
1.श्लो॰ 3 कुन्दइन्दुदरगौरसुन्दरं अम्बिकापतिमभीष्टसिद्धिदम् । कारुणीककलकञ्जलोचनं नौमि शंकरमनंगमोचनम् ॥
kundaindudaragaurasundaraṃ ambikāpatimabhīṣṭasiddhidam | kāruṇīkakalakañjalocanaṃ naumi śaṃkaramanaṃgamocanam ||
दो॰ दोहा रहा एक दिन अवधि कर, अति आरत पुर लोग । जहाँ तहँ सोचहिँ नारि नर कृस तन राम बियोग ॥
rahā eka dina avadhi kara, ati ārata pura loga | jahām̐ taham̐ socahim̐ nāri nara kṛsa tana rāma biyoga ||
दो॰ दोहा सगुन होहिं सुन्दर सकल, मन प्रसन्न सब केर । प्रभु आगमन जनाव जनु, नगर रम्य चहुँ फेर ॥
saguna hohiṃ sundara sakala, mana prasanna saba kera | prabhu āgamana janāva janu, nagara ramya cahum̐ phera ||
दो॰ दोहा कौसल्यादि मातु सब, मन अनन्द अस होइ । आयउ प्रभु सिय अनुज जुत, कहन चहत अब कोई ॥
kausalyādi mātu saba, mana ananda asa hoi | āyau prabhu siya anuja juta, kahana cahata aba koī ||
दो॰ दोहा भरत नयन भुज दच्छिन, फरकत बारहिं बार । जानि सगुन मन हरष अति, लागे करन बिचार ॥
bharata nayana bhuja dacchina, pharakata bārahiṃ bāra | jāni saguna mana haraṣa ati, lāge karana bicāra ||
1.1 रहेउ एक दिन अवधि अधारा । समुझत मन दुख भयउ अपारा ॥ कारन कवन नाथ नहिँ आये । जानि कुटिल किधौँ मोहि बिसरायउ ॥
raheu eka dina avadhi adhārā | samujhata mana dukha bhayau apārā || kārana kavana nātha nahim̐ āye | jāni kuṭila kidhaum̐ mohi bisarāyau ||
1.2 अहह धन्य लछिमन बड़भागी । राम-पदारबिन्द अनुरागी ॥ कपटी कुटिल मोहि प्रभु चीन्हा । तात नाथ सङ्ग नहिँ लीन्हा ॥
ahaha dhanya lachimana bar̤abhāgī | rāma-padārabinda anurāgī || kapaṭī kuṭila mohi prabhu cīnhā | tāta nātha saṅga nahim̐ līnhā ||
1.3 जौँ करनी समुझै प्रभु मोरी । नहिँ निस्तार कलप सत कोरी ॥ जन अवगुन प्रभु मान न काऊ । दीन बन्धु अति मृदुल सुभाऊ ॥
jaum̐ karanī samujhai prabhu morī | nahim̐ nistāra kalapa sata korī || jana avaguna prabhu māna na kāū | dīna bandhu ati mṛdula subhāū ||
1.4 मोरि जियँ भरोस दृढ़ सोई । मिलिहहिँ राम सगुन सुभ होई ॥ बीतें अवधि रहहिँ जौँ प्राना । अधम कवन जग मोहि समाना ॥
mori jiyam̐ bharosa dṛr̤ha soī | milihahim̐ rāma saguna subha hoī || bīteṃ avadhi rahahim̐ jaum̐ prānā | adhama kavana jaga mohi samānā ||
दो॰ 1 (क) दोहा राम-बिरह सागर महँ, भरत मगन मन होत । बिप्र रूप धरि पवन-सुत, आइ गयउ जनु पोत ॥
rāma-biraha sāgara maham̐, bharata magana mana hota | bipra rūpa dhari pavana-suta, āi gayau janu pota ||
दो॰ 1 (ख) दोहा बैठि देखि कुसासन, जटा-मुकुट कृस गात । राम राम रघुपति जपत, स्त्रवत नयन जलजात ॥
baiṭhi dekhi kusāsana, jaṭā-mukuṭa kṛsa gāta | rāma rāma raghupati japata, stravata nayana jalajāta ||
पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0
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