उत्तरकाण्ड

अध्याय 19: अंगद की विदाई, हनुमान रुकते हैं

8 श्लोक · 19 में से 130

इस अध्याय में क्या होता है

अंगद की विदाई, हनुमान रुकते हैं

भाई वानरों को विदा करने चलते हैं। अंगद बार-बार मुड़कर राम को देखते और दण्डवत करते हैं, चाहते हैं कि उन्हें रुकने को कहा जाए। प्रभु का देखना, बोलना, हँसकर मिलना याद कर वे शोक करते हैं; फिर प्रभु का रुख देखकर चरण हृदय में रखकर चल देते हैं। हनुमान सुग्रीव से दस दिन और रघुपति की सेवा की विनती करते हैं, और सुग्रीव कहते हैं, तुम पुण्य के पुंज हो, जाकर सेवा करो। अंगद हनुमान से कहते हैं, प्रभु से मेरा दण्डवत कहना और बार-बार मेरी याद दिलाना। हनुमान लौटकर वह प्रीति सुनाते हैं, और भगवान मग्न हो जाते हैं। काकभुशुण्डि गरुड़ से कहते हैं, राम का चित्त वज्र से कठोर और फूल से कोमल है, इसे कौन समझे?

19.1

भरत अनुज सौमित्र समेता । पठवन चले भगत कृत चेता ॥
अङ्गद हृदयँ प्रेम नहिँ थोरा । फिरि फिरि चितव राम कीं ओरा ॥

bharata anuja saumitra sametā | paṭhavana cale bhagata kṛta cetā ||
aṅgada hṛdayam̐ prema nahim̐ thorā | phiri phiri citava rāma kīṃ orā ||

19.2

बार बार कर दंड-प्रनामा । मन अस रहन कहहिँ मोहि रामा ॥
राम बिलोकनि बोलनि चलनी । सुमिरि सुमिरि सोचत हँसि मिलनी ॥

bāra bāra kara daṃḍa-pranāmā | mana asa rahana kahahim̐ mohi rāmā ||
rāma bilokani bolani calanī | sumiri sumiri socata ham̐si milanī ||

19.3

प्रभु रुख देखि बिनय बहु भाखी । चलेउ हृदयँ पद-पङ्कज राखी ॥
अति आदर सब कपि पहुँचायें । भाइन्ह सहित राम फिरि आये ॥

prabhu rukha dekhi binaya bahu bhākhī | caleu hṛdayam̐ pada-paṅkaja rākhī ||
ati ādara saba kapi pahum̐cāyeṃ | bhāinha sahita rāma phiri āye ||

19.4

सब सुग्रीव चरन गहि नाना । भाँति बिनय कीन्ही हनुमाना ॥
दिन दस करि रघुपति पद सेवा । पुनि तव चरन देखिहउँ देवा ॥

saba sugrīva carana gahi nānā | bhām̐ti binaya kīnhī hanumānā ||
dina dasa kari raghupati pada sevā | puni tava carana dekhihaum̐ devā ||

19.5

पुन्य-पुञ्ज तुम्ह पवन-कुमारा । सेवहु जाइ कृपा-आगारा ॥
अस कहि कपि सब चले तुरन्ता । अङ्गद कहइ सुनहु हनुमन्ता ॥

punya-puñja tumha pavana-kumārā | sevahu jāi kṛpā-āgārā ||
asa kahi kapi saba cale turantā | aṅgada kahai sunahu hanumantā ||

दो॰ 19 (क)दोहा

दो कहेहु दंडवत प्रभु सन, तुम्हहिँ कहउँ कर जोरि ।
बार बार रघुनायकहि, सुरति कराएहु मोरि ॥

do kahehu daṃḍavata prabhu sana, tumhahim̐ kahaum̐ kara jori |
bāra bāra raghunāyakahi, surati karāehu mori ||

दो॰ 19 (ख)दोहा

अस कहि चलेउ बालिसुत, फिरि आयउ हनुमन्त ।
तासु प्रीति प्रभु सन कही, मगन भये भगवन्त ॥

asa kahi caleu bālisuta, phiri āyau hanumanta |
tāsu prīti prabhu sana kahī, magana bhaye bhagavanta ||

दो॰ 19 (ग)दोहा

कुलिसहु चाहि कठोर अति, कोमल कुसुमहु चाहि ।
चित्त खगेस राम कर, समुझि परइ कहु काहि ॥

kulisahu cāhi kaṭhora ati, komala kusumahu cāhi |
citta khagesa rāma kara, samujhi parai kahu kāhi ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0