उत्तरकाण्ड

अध्याय 15: राज्याभिषेक-कथा सुनने का फल

6 श्लोक · 15 में से 130

इस अध्याय में क्या होता है

राज्याभिषेक-कथा सुनने का फल

काकभुशुण्डि गरुड़ से कहते हैं, अभिषेक की यह पावन कथा तीनों तापों और संसार के भय को मिटाती है, और सुनने वाले वैराग्य और विवेक पाते हैं। जो कामना के साथ इसे सुनते या गाते हैं, वे सुख और सम्पत्ति पाते हैं, देवदुर्लभ सुख यहीं भोगते हैं, और अन्त में रघुपति के धाम जाते हैं। मुक्त, विरक्त और विषयी, तीनों भक्ति पाते हैं। मैंने अपनी बुद्धि के अनुसार कथा कही है; यह मोह की नदी पार करने की सुन्दर नाव है। कोसलपुरी में नित नए मंगल होते हैं और सबके मन में राम-चरणों की प्रीति नित नई होती है। ब्रह्मानन्द में मग्न वानरों को दिन बीतते पता नहीं चलता, और छह मास बीत जाते हैं।

15.1

सुनु खगपति यह कथा पावनी । त्रिबिधि ताप भव भय दावनी ॥
महाराज कर सुभ अभिषेका । सुनत लहहिँ नर बिरति बिबेका ॥

sunu khagapati yaha kathā pāvanī | tribidhi tāpa bhava bhaya dāvanī ||
mahārāja kara subha abhiṣekā | sunata lahahim̐ nara birati bibekā ||

15.2

जे सकाम नर सुनहिँ जे गावहिं । सुख सम्पति नाना विधि पावहिँ ॥
सुर-दुर्लभ सुख करि जग माहीं । अन्तकाल रघुपति-पुर जाहीं ॥

je sakāma nara sunahim̐ je gāvahiṃ | sukha sampati nānā vidhi pāvahim̐ ||
sura-durlabha sukha kari jaga māhīṃ | antakāla raghupati-pura jāhīṃ ||

15.3

सुनहिँ बिमुक्त बिरत अरु बिषई । लहहिँ भगति गति सम्पति नई ॥
खगपति राम कथा मैं बरनी । स्वमति बिलास त्रास दुख हरनी ॥

sunahim̐ bimukta birata aru biṣaī | lahahim̐ bhagati gati sampati naī ||
khagapati rāma kathā maiṃ baranī | svamati bilāsa trāsa dukha haranī ||

15.4

बिरति बिबेक भगति दृढ़ करनी । मोह नदी कहँ सुन्दर तरनी ॥
नित नव मङ्गल कौसलपुरी । हरषित रहहिं लोग सब कुरी ॥

birati bibeka bhagati dṛr̤ha karanī | moha nadī kaham̐ sundara taranī ||
nita nava maṅgala kausalapurī | haraṣita rahahiṃ loga saba kurī ||

15.5

नित नइ प्रीति राम-पद-पङ्कज । सबकें जिन्हहि नमत सिव मुनि अज ॥
मङ्गन बहु प्रकार पहिराये । द्विजन्ह दान नाना विधि पाये ॥

nita nai prīti rāma-pada-paṅkaja | sabakeṃ jinhahi namata siva muni aja ||
maṅgana bahu prakāra pahirāye | dvijanha dāna nānā vidhi pāye ||

दो॰ 15दोहा

ब्रह्मानन्द मगन कपि, सब कें प्रभु-पद प्रीति ।
जात न जाने दिवस तिन्ह, गये मास षट बीति ॥

brahmānanda magana kapi, saba keṃ prabhu-pada prīti |
jāta na jāne divasa tinha, gaye māsa ṣaṭa bīti ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0