बिसरे गृह सपनेहुँ सुधि नाहीँ । जिमिपर-द्रोह सन्त मन माही ॥
तब रघुपति सब सखा बोलाये । आइ सबन्हि सादर सिरु नाए ॥
bisare gṛha sapanehum̐ sudhi nāhīm̐ | jimipara-droha santa mana māhī ||
taba raghupati saba sakhā bolāye | āi sabanhi sādara siru nāe ||
5 श्लोक · 16 में से 130
वानर अपने घरों को ऐसे भूल गए हैं जैसे सन्त के मन से पराया द्रोह मिट जाता है। तब रघुपति सखाओं को बुलाकर प्रेम से पास बैठाते हैं और कोमल वचन कहते हैं। तुमने मेरी बहुत सेवा की; मुँह पर तुम्हारी बड़ाई कैसे करूँ? मेरे लिए तुमने घर के सुख छोड़े, इसलिए तुम मुझे अत्यन्त प्रिय हो। भाई, राज्य, सम्पत्ति, वैदेही, शरीर, घर और परिवार सब प्रिय हैं, पर तुम्हारे समान कोई नहीं। मैं झूठ नहीं कहता। सेवक सबको प्रिय होता है, यह संसार की रीति है, पर मुझे अपने दास पर उससे भी अधिक प्रीति है। अब घर जाओ। दृढ़ नियम से मेरा भजन करना, मुझे सर्वव्यापी और सबका हितकारी जानकर प्रेम करना।
बिसरे गृह सपनेहुँ सुधि नाहीँ । जिमिपर-द्रोह सन्त मन माही ॥
तब रघुपति सब सखा बोलाये । आइ सबन्हि सादर सिरु नाए ॥
bisare gṛha sapanehum̐ sudhi nāhīm̐ | jimipara-droha santa mana māhī ||
taba raghupati saba sakhā bolāye | āi sabanhi sādara siru nāe ||
परम प्रीति समीप बैठारे । भगत सुखद मृदु बचन उचारे ॥
तुम्ह अति कीन्ह मोरि सेवकाई । मुख पर केहि बिधि करौँ बड़ाई ॥
parama prīti samīpa baiṭhāre | bhagata sukhada mṛdu bacana ucāre ||
tumha ati kīnha mori sevakāī | mukha para kehi bidhi karaum̐ bar̤āī ||
तातें मोहि तुम्ह अति प्रिय लागे । मम हित लागि भवन सुख त्यागे ॥
अनुज राज सम्पति बैदेही । देह गेह परिवार सनेही ॥
tāteṃ mohi tumha ati priya lāge | mama hita lāgi bhavana sukha tyāge ||
anuja rāja sampati baidehī | deha geha parivāra sanehī ||
सब मम प्रिय नहिँ तुम्हहिँ समाना । मृषा न कहउँ मोर यह माना ॥
सब के प्रिय सेवक यह नीती । मोरें अधिक दास पर प्रीती ॥
saba mama priya nahim̐ tumhahim̐ samānā | mṛṣā na kahaum̐ mora yaha mānā ||
saba ke priya sevaka yaha nītī | moreṃ adhika dāsa para prītī ||
अब गृह जाहु सखा सब, भजेहु मोहि दृढ़ नेम ।
सदा सर्बगत सर्बहित, जानि करेहु अति प्रेम ॥
aba gṛha jāhu sakhā saba, bhajehu mohi dṛr̤ha nema |
sadā sarbagata sarbahita, jāni karehu ati prema ||
पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0