शम्भु छोटे, द्रुत छन्दों में गाते हैं। श्रीराम की जय हो; संसार के ताप से व्याकुल जनों की रक्षा कीजिए। आपके बाणों की आग में राक्षस पतंगों की तरह जल गए। आप मद और ममता की रात्रि मिटाने वाले सूर्य हैं; कुभोगों के बाण से मनुष्यों को हिरन की तरह मारने वाले कामदेव रूपी किरात को मारिए। जो आपके चरणों का निरादर करते हैं, उन्हें रोग और वियोग घेरते हैं। जिन्हें आपकी कथा का सहारा है और सन्त प्रिय हैं, उनमें न लोभ है न मान, वे आदर-निरादर समान मानकर पृथ्वी पर सुखी विचरते हैं। फिर वर माँगते हैं: चरणकमलों में अचल भक्ति और सदा सत्संग। उमापति कैलास लौटते हैं, और प्रभु वानरों को सुखद आवास दिलाते हैं।
बहु रोग वियोगन्हि लोग हये । भवदंघ्रि निरादर के फल ये । भव सिन्धु अगाध परे, नर ते । पद-पङ्कज प्रेम न जे करते ॥ अति दीन मलीन दुखी नितहीं । जिन्ह के पद-पङ्कज प्रेम नहीं । अवलम्ब भवन्त कथा जिन्ह के । प्रिय सन्त अनन्त सदा तिन्ह कें ॥
bahu roga viyoganhi loga haye | bhavadaṃghri nirādara ke phala ye | bhava sindhu agādha pare, nara te | pada-paṅkaja prema na je karate || ati dīna malīna dukhī nitahīṃ | jinha ke pada-paṅkaja prema nahīṃ | avalamba bhavanta kathā jinha ke | priya santa ananta sadā tinha keṃ ||
नहिं राग न लोभ न मान मदा । तिन्ह कें सम बैभव वा बिपदा । एहि ते तव सेवक होत मुदा । मुनि त्यागत जोग भरोस सदा ॥ करि प्रेम निरन्तर नेम लिये । पद-पङ्कज सेवत सुद्ध हिये । सम मानि निरादर आदरही । सब सन्त सुखी बिचरन्ति मही ॥
nahiṃ rāga na lobha na māna madā | tinha keṃ sama baibhava vā bipadā | ehi te tava sevaka hota mudā | muni tyāgata joga bharosa sadā || kari prema nirantara nema liye | pada-paṅkaja sevata suddha hiye | sama māni nirādara ādarahī | saba santa sukhī bicaranti mahī ||