उत्तरकाण्ड

अध्याय 13: वेदों द्वारा श्रीराम की स्तुति

8 श्लोक · 13 में से 130

इस अध्याय में क्या होता है

वेदों द्वारा श्रीराम की स्तुति

बन्दीजन के वेश में वेद छह छन्दों में स्तुति करते हैं। सगुण-निर्गुण रूप वाले, रावण को मारने वाले, संसार का भार हरने को मनुष्य बने प्रभु, आपकी जय हो। आपकी माया के वश सब जीव जन्म-मरण के मार्ग पर भटकते हैं; जिन पर आपकी कृपादृष्टि पड़ी, वे तीनों तापों से छूटे। जो ज्ञान के मद में भक्ति का आदर नहीं करते, वे देवदुर्लभ पद पाकर भी गिरते हैं, और जो विश्वास से नाम जपते हैं वे सहज तर जाते हैं। वे उन चरणों का स्तवन करते हैं जिनकी धूल से अहल्या तरी और जिनके नख से गंगा निकलीं, और अव्यक्त मूल वाले संसार-वृक्ष को नमन करते हैं। दूसरे निर्गुण ब्रह्म का ध्यान करें, हम आपका सगुण यश गाएँ। फिर वे अन्तर्धान होते हैं, और शम्भु प्रभु के पास आते हैं।

13.छं॰ 1छन्द

जय सगुन निर्गुन रूप रूप अनूप भूप सिरोमने ।
दसकन्धरादि प्रचंड निसिचर, प्रबल खल भुज बल हने ॥
अवतार नर संसार भार बिभंजि दारुन दुख दहे ।
जय प्रनतपाल दयाल प्रभु संजुक्त सक्ति नमामहे ॥

jaya saguna nirguna rūpa rūpa anūpa bhūpa siromane |
dasakandharādi pracaṃḍa nisicara, prabala khala bhuja bala hane ||
avatāra nara saṃsāra bhāra bibhaṃji dāruna dukha dahe |
jaya pranatapāla dayāla prabhu saṃjukta sakti namāmahe ||

13.छं॰ 2छन्द

तव विषम माया बस सुरासुर, नाग नर अग जग हरे ।
भव पन्थ भ्रमत अमित दिवस निसि, काल कर्म गुननि भरे ॥
जे नाथ करि करुना बिलोके, त्रिबिधि दुख ते निर्वहे ।
भव-खेद छेदन दच्छ हम कह, रच्छ राम नमामहे ॥

tava viṣama māyā basa surāsura, nāga nara aga jaga hare |
bhava pantha bhramata amita divasa nisi, kāla karma gunani bhare ||
je nātha kari karunā biloke, tribidhi dukha te nirvahe |
bhava-kheda chedana daccha hama kaha, raccha rāma namāmahe ||

13.छं॰ 3छन्द

जे ज्ञान-मान-बिमत्त तव भव, हरनि भगति न आदरी ।
ते पाइ सुर-दुर्लभ-पदादपि, पात हम देखत हरी ॥
बिस्वास करि सब आस परिहरि, दास तव जे होइ रहे ।
जपि नाम तव बिनु श्रम तरहिं भव, नाथ सो समरामहे ॥

je jñāna-māna-bimatta tava bhava, harani bhagati na ādarī |
te pāi sura-durlabha-padādapi, pāta hama dekhata harī ||
bisvāsa kari saba āsa parihari, dāsa tava je hoi rahe |
japi nāma tava binu śrama tarahiṃ bhava, nātha so samarāmahe ||

13.छं॰ 4छन्द

जे चरन सिव अज पूज्य रज़ सुभ, परसि मुनि पतिनी तरी ।
नख निर्गता मुनि बन्दिता त्रय,-लोक पावनि सुरसरी ॥
ध्वज कुलिस अङ्कुस कञ्ज जुत बन, फिरत कंटक किन लहे ।
पद कञ्ज द्वन्द मुकुन्द राम रमेस नित्य भजाम हे ॥

je carana siva aja pūjya raza subha, parasi muni patinī tarī |
nakha nirgatā muni banditā traya,-loka pāvani surasarī ||
dhvaja kulisa aṅkusa kañja juta bana, phirata kaṃṭaka kina lahe |
pada kañja dvanda mukunda rāma ramesa nitya bhajāma he ||

13.छं॰ 5छन्द

अब्यक्तमूलमनादि-तरु त्वच, चारि निगमागम भने ।
षट-कन्ध साखा पञ्च बीस अनेक पर्न सुमन घने ॥
फल जुगल-बिधि, कटु मधुर बेलि, अकेलि जेहि आश्रित रहे ।
पल्लवत फूलत नवल नित संसार-बिटप नमाम हे ॥

abyaktamūlamanādi-taru tvaca, cāri nigamāgama bhane |
ṣaṭa-kandha sākhā pañca bīsa aneka parna sumana ghane ||
phala jugala-bidhi, kaṭu madhura beli, akeli jehi āśrita rahe |
pallavata phūlata navala nita saṃsāra-biṭapa namāma he ||

13.छं॰ 6छन्द

जे ब्रह्म अजमद्वैतमनुभवगम्य मनपर ध्यावहीं ।
ते कहहुं जानहुँ नाथ हम तव, सगुन जल नित गावहीं ॥
करुनायतन प्रभु सदगुनाकर, देव यह बर मागहीं ।
मन बचन कर्म बिकार तजि तव, चरन हम अनुरागहीं ॥

je brahma ajamadvaitamanubhavagamya manapara dhyāvahīṃ |
te kahahuṃ jānahum̐ nātha hama tava, saguna jala nita gāvahīṃ ||
karunāyatana prabhu sadagunākara, deva yaha bara māgahīṃ |
mana bacana karma bikāra taji tava, carana hama anurāgahīṃ ||

दो॰ 13 (क)दोहा

सब के देखत बेदन्ह, बिनती कीन्हि उदार ।
अन्तरधान भये पुनि, गये ब्रह्म-आगार ॥

saba ke dekhata bedanha, binatī kīnhi udāra |
antaradhāna bhaye puni, gaye brahma-āgāra ||

दो॰ 13 (ख)दोहा

बैनतेय सुनु सम्भु तब, आये जहँ रघुबीर ।
बिनय करत गदगद गिरा, पूरित पुलक सरीर ॥

bainateya sunu sambhu taba, āye jaham̐ raghubīra |
binaya karata gadagada girā, pūrita pulaka sarīra ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0