राम कथा गिरिजा में बरनी । कलि मल समनि मनोमल हरनी ॥
संसृति रोग सजीवन मूरी । राम कथा गावहिँ स्रुति सूरी ॥
rāma kathā girijā meṃ baranī | kali mala samani manomala haranī ||
saṃsṛti roga sajīvana mūrī | rāma kathā gāvahim̐ sruti sūrī ||
5 श्लोक · 129 में से 130
भगवान शिव गिरिजा से कहते हैं कि उन्होंने वह रामकथा कही जो कलि का मल शान्त करती और मन का मैल हरती है। वह संसार-रोग की संजीवनी बूटी है। इसमें सात सुन्दर सोपान हैं, सात काण्ड, जो रघुपति-भक्ति के मार्ग की सीढ़ियाँ हैं; जिस पर हरि की बड़ी कृपा हो, वही इन पर पाँव रखता है। जो कपट छोड़कर इसे गाते हैं, वे मनचाहा पाते हैं; जो इसे कहते, सुनते या सराहते हैं, वे भवसागर को गाय के खुर के गड्ढे-सा पार करते हैं। प्रसन्न गिरिजा मधुर वाणी में बोलीं: नाथ, आपकी कृपा से मेरा सन्देह मिट गया और राम-चरणों में नया प्रेम उपजा। मैं कृतकृत्य हुई, सब क्लेश बीत गए।
राम कथा गिरिजा में बरनी । कलि मल समनि मनोमल हरनी ॥
संसृति रोग सजीवन मूरी । राम कथा गावहिँ स्रुति सूरी ॥
rāma kathā girijā meṃ baranī | kali mala samani manomala haranī ||
saṃsṛti roga sajīvana mūrī | rāma kathā gāvahim̐ sruti sūrī ||
एहि महँ रुचिर सप्त सोपाना । रघुपति भगति केर पंथाना ॥
अति हरि कृपा जाहि पर होई । पाउँ देइ एहिं मारग सोई ॥
ehi maham̐ rucira sapta sopānā | raghupati bhagati kera paṃthānā ||
ati hari kṛpā jāhi para hoī | pāum̐ dei ehiṃ māraga soī ||
मन कामना सिद्धि नर पावा । जे यह कथा कपट तजि गावा ॥
कहहिँ सुनहिँ अनुमोदन करहीं । ते गोपद इव भवनिधि तरहीं ॥
mana kāmanā siddhi nara pāvā | je yaha kathā kapaṭa taji gāvā ||
kahahim̐ sunahim̐ anumodana karahīṃ | te gopada iva bhavanidhi tarahīṃ ||
सुनि सब कथा हृदयँ अति भाई । गिरिजा बोली गिरा सुहाई ॥
नाथ कृपाँ मम गत सन्देहा । राम-चरन उपजेउ नव नेहा ॥
suni saba kathā hṛdayam̐ ati bhāī | girijā bolī girā suhāī ||
nātha kṛpām̐ mama gata sandehā | rāma-carana upajeu nava nehā ||
मैं कृतकृत्य भइउँ अब, तव प्रसाद बिस्वेस ।
उपजी राम भगति दृढ़, बीते सकल कलेस ॥
maiṃ kṛtakṛtya bhaium̐ aba, tava prasāda bisvesa |
upajī rāma bhagati dṛr̤ha, bīte sakala kalesa ||
पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0