उत्तरकाण्ड

अध्याय 129: सात सोपान, और गिरिजा कृतकृत्य

5 श्लोक · 129 में से 130

इस अध्याय में क्या होता है

सात सोपान, और गिरिजा कृतकृत्य

भगवान शिव गिरिजा से कहते हैं कि उन्होंने वह रामकथा कही जो कलि का मल शान्त करती और मन का मैल हरती है। वह संसार-रोग की संजीवनी बूटी है। इसमें सात सुन्दर सोपान हैं, सात काण्ड, जो रघुपति-भक्ति के मार्ग की सीढ़ियाँ हैं; जिस पर हरि की बड़ी कृपा हो, वही इन पर पाँव रखता है। जो कपट छोड़कर इसे गाते हैं, वे मनचाहा पाते हैं; जो इसे कहते, सुनते या सराहते हैं, वे भवसागर को गाय के खुर के गड्ढे-सा पार करते हैं। प्रसन्न गिरिजा मधुर वाणी में बोलीं: नाथ, आपकी कृपा से मेरा सन्देह मिट गया और राम-चरणों में नया प्रेम उपजा। मैं कृतकृत्य हुई, सब क्लेश बीत गए।

129.1

राम कथा गिरिजा में बरनी । कलि मल समनि मनोमल हरनी ॥
संसृति रोग सजीवन मूरी । राम कथा गावहिँ स्रुति सूरी ॥

rāma kathā girijā meṃ baranī | kali mala samani manomala haranī ||
saṃsṛti roga sajīvana mūrī | rāma kathā gāvahim̐ sruti sūrī ||

129.2

एहि महँ रुचिर सप्त सोपाना । रघुपति भगति केर पंथाना ॥
अति हरि कृपा जाहि पर होई । पाउँ देइ एहिं मारग सोई ॥

ehi maham̐ rucira sapta sopānā | raghupati bhagati kera paṃthānā ||
ati hari kṛpā jāhi para hoī | pāum̐ dei ehiṃ māraga soī ||

129.3

मन कामना सिद्धि नर पावा । जे यह कथा कपट तजि गावा ॥
कहहिँ सुनहिँ अनुमोदन करहीं । ते गोपद इव भवनिधि तरहीं ॥

mana kāmanā siddhi nara pāvā | je yaha kathā kapaṭa taji gāvā ||
kahahim̐ sunahim̐ anumodana karahīṃ | te gopada iva bhavanidhi tarahīṃ ||

129.4

सुनि सब कथा हृदयँ अति भाई । गिरिजा बोली गिरा सुहाई ॥
नाथ कृपाँ मम गत सन्देहा । राम-चरन उपजेउ नव नेहा ॥

suni saba kathā hṛdayam̐ ati bhāī | girijā bolī girā suhāī ||
nātha kṛpām̐ mama gata sandehā | rāma-carana upajeu nava nehā ||

दो॰ 129दोहा

मैं कृतकृत्य भइउँ अब, तव प्रसाद बिस्वेस ।
उपजी राम भगति दृढ़, बीते सकल कलेस ॥

maiṃ kṛtakṛtya bhaium̐ aba, tava prasāda bisvesa |
upajī rāma bhagati dṛr̤ha, bīte sakala kalesa ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0