उत्तरकाण्ड

अध्याय 130: तुलसीदास का समापन: राम ही तारते हैं

इति श्रीरामचरितमानसे सकलकलिकलुषविध्वंसने अविरल हरिभक्ति सम्पादनो नाम सप्तमः सोपानः समाप्तः ।

11 श्लोक · 130 में से 130

इस अध्याय में क्या होता है

तुलसीदास का समापन: राम ही तारते हैं

शम्भु-उमा संवाद पूरा होता है, जो सुख देता, विषाद मिटाता, सन्देह काटता और राम-उपासकों को सबसे प्रिय है। फिर तुलसीदास स्वयं बोलते हैं। इस कलिकाल में दूसरा साधन नहीं, न योग, न यज्ञ, न व्रत: राम को सुमिरो, राम को गाओ, राम के गुण सुनो। पतितपावन राम ने गणिका, अजामिल, व्याध, गीध और गज जैसे अनेकों को तारा; अत्यन्त पापी भी एक बार नाम लेकर पावन हो जाते हैं। जो रघुवंशभूषण का यह चरित कहते, सुनते या गाते हैं, वे बिना श्रम राम-धाम जाते हैं। उनकी कृपा के लेश से मन्दबुद्धि तुलसीदास ने भी परम विश्राम पाया। मेरे समान दीन नहीं, आपके समान दीनहितकारी नहीं; जैसे कामी को नारी और लोभी को धन प्रिय है, वैसे ही राम मुझे निरन्तर प्रिय लगें। दो संस्कृत श्लोकों से मानस पूर्ण होता है।

130.1

यह सुभ सम्भु-उमा सम्बादा । सुख सम्पादन समन बिषादा ॥
भव भञ्जन गञ्जन सन्देहा । जन रंजन सज्जन प्रिय एहा ॥

yaha subha sambhu-umā sambādā | sukha sampādana samana biṣādā ||
bhava bhañjana gañjana sandehā | jana raṃjana sajjana priya ehā ||

130.2

राम-उपासक जे जग माहीं । एहि सम प्रिय तिन्ह के कछु नाहीं ॥
रघुपति कृपाँ जथामति गावा । मैं यह पावन चरित सुहावा ॥

rāma-upāsaka je jaga māhīṃ | ehi sama priya tinha ke kachu nāhīṃ ||
raghupati kṛpām̐ jathāmati gāvā | maiṃ yaha pāvana carita suhāvā ||

130.3

एहिं कलिकाल न साधन दूजा । जोग जज्ञ जप तप ब्रत पूजा ॥
रामहि सुमिरिअ गाइअ रामहि । सन्तत सुनिय राम गुन-ग्रामहि ॥

ehiṃ kalikāla na sādhana dūjā | joga jajña japa tapa brata pūjā ||
rāmahi sumiria gāia rāmahi | santata suniya rāma guna-grāmahi ||

130.4

जासु पतित-पावन बड़ बाना । गावहिँ कवि श्रुति सन्त पुराना ॥
ताहि भजहि मन तजि कुटिलाई । राम भजें गति केहिं नहिं पाई ॥

jāsu patita-pāvana bar̤a bānā | gāvahim̐ kavi śruti santa purānā ||
tāhi bhajahi mana taji kuṭilāī | rāma bhajeṃ gati kehiṃ nahiṃ pāī ||

130.छं॰ 1छन्द

पाई न केहिं गति पतित पावन राम भजि सुनु सठ मना ।
गनिका अजामिल ब्याध गीध गजादि खल तारे घना ॥
आभीर जमन किरात खस स्वपचादि अति अघ रूप जे ।
कहि नाम बारक तेपि पावन होहिं राम नमामि ते ॥

pāī na kehiṃ gati patita pāvana rāma bhaji sunu saṭha manā |
ganikā ajāmila byādha gīdha gajādi khala tāre ghanā ||
ābhīra jamana kirāta khasa svapacādi ati agha rūpa je |
kahi nāma bāraka tepi pāvana hohiṃ rāma namāmi te ||

130.छं॰ 2छन्द

रघुबंस-भूषन चरित यह नर कहहिं सुनहिँ जे गावहीं ।
कलि मल मनोमल धोइ बिनु श्रम राम धाम सिधावहीं ॥
सत पञ्च चौपाईं मनोहर, जानि जो नर उर धरैं ।
दारुन अबिद्या पञ्च-जनित बिकार श्रीरघुबर हरै ॥

raghubaṃsa-bhūṣana carita yaha nara kahahiṃ sunahim̐ je gāvahīṃ |
kali mala manomala dhoi binu śrama rāma dhāma sidhāvahīṃ ||
sata pañca caupāīṃ manohara, jāni jo nara ura dharaiṃ |
dāruna abidyā pañca-janita bikāra śrīraghubara harai ||

130.छं॰ 3छन्द

सुन्दर सुजान कृपा निधान अनाथ पर कर प्रीति जो ।
सो एक राम अकाम-हित निर्बान प्रद सम आन को ॥
जाकी कृपा लवलेस ते मतिमन्द तुलसीदासहूँ ।
पायो परम बिश्रामु राम समान प्रभु नाहीं कहूँ ॥

sundara sujāna kṛpā nidhāna anātha para kara prīti jo |
so eka rāma akāma-hita nirbāna prada sama āna ko ||
jākī kṛpā lavalesa te matimanda tulasīdāsahūm̐ |
pāyo parama biśrāmu rāma samāna prabhu nāhīṃ kahūm̐ ||

दो॰ 130 (क)दोहा

मो सम दीन न दीन हित, तुम्ह समान रघुबीर ।
अस बिचारि रघुबंस मनि, हरहु विषम भव भीर ॥

mo sama dīna na dīna hita, tumha samāna raghubīra |
asa bicāri raghubaṃsa mani, harahu viṣama bhava bhīra ||

दो॰ 130 (ख)दोहा

कामिहि नारि पिआरि जिमि, लोभहि प्रिय जिमि दाम ।
तिमि रघुनाथ निरन्तर, प्रिय लागहु मोहि राम ॥

kāmihi nāri piāri jimi, lobhahi priya jimi dāma |
timi raghunātha nirantara, priya lāgahu mohi rāma ||

130.श्लो॰ 1

श्रीमद्रामपदाब्जभक्तिमनिशं प्राप्त्यै तु रामायणम् ।
भाषाबद्धमिदं चकार तुलसीदासस्तथा मानसम् ॥

śrīmadrāmapadābjabhaktimaniśaṃ prāptyai tu rāmāyaṇam |
bhāṣābaddhamidaṃ cakāra tulasīdāsastathā mānasam ||

130.श्लो॰ 2

मायामोहमलापहं सुविमलं प्रेमाम्बुपूरं शुभम् ।
ते संसारपतङ्गघोरकिरणैर्दह्यन्ति नो मानवाः ॥

māyāmohamalāpahaṃ suvimalaṃ premāmbupūraṃ śubham |
te saṃsārapataṅgaghorakiraṇairdahyanti no mānavāḥ ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0