उत्तरकाण्ड

अध्याय 128: रामकथा के अधिकारी कौन

5 श्लोक · 128 में से 130

इस अध्याय में क्या होता है

रामकथा के अधिकारी कौन

भगवान शिव उमा से कहते हैं कि उन्होंने यह कथा पहले गुप्त रखी थी, पर उनके मन की अधिक प्रीति देखकर अपनी मति भर रघुपति की कथा सुनाई। फिर बताते हैं कि यह किससे न कहें: मन लगाकर न सुनने वाले मूर्ख और हठी से, लोभी, क्रोधी और कामी से, चराचर के स्वामी को न भजने वाले से, और ब्राह्मण-द्रोही से, चाहे वह इन्द्र-सा राजा हो। रामकथा के अधिकारी वे हैं जिन्हें सत्संग, गुरु के चरण और नीति प्यारे हैं और जो द्विजों की सेवा करते हैं। जिसे श्रीरघुराई प्राणों के समान प्रिय हैं, उसे यह विशेष सुख देती है। जो राम-चरणों में प्रीति या निर्वाण चाहे, वह भाव सहित इस कथा को कानों से पिए।

128.1

मति अनुरूप कथा मैं भाखी । जद्यपि प्रथम गुप्त करि राखी ॥
तव मन प्रीति देखि अधिकाई । तब मैं रघुपति कथा सुनाई ॥

mati anurūpa kathā maiṃ bhākhī | jadyapi prathama gupta kari rākhī ||
tava mana prīti dekhi adhikāī | taba maiṃ raghupati kathā sunāī ||

128.2

यह न कहिय सठही हठसीलहि । जो मन लाइ न सुन हरि लीलहि ॥
कहिय न लोभिहि क्रोधहि कामिहि । जो न भजइ सचराचर स्वामिहि ॥

yaha na kahiya saṭhahī haṭhasīlahi | jo mana lāi na suna hari līlahi ||
kahiya na lobhihi krodhahi kāmihi | jo na bhajai sacarācara svāmihi ||

128.3

द्विज द्रोहिहि न सुनाइअ कबहूँ । सुरपति सरिस होइ नृप जबहूँ ॥
राम कथा के तेइ अधिकारी । जिन्ह कें सतसङ्गति अति प्यारी ॥

dvija drohihi na sunāia kabahūm̐ | surapati sarisa hoi nṛpa jabahūm̐ ||
rāma kathā ke tei adhikārī | jinha keṃ satasaṅgati ati pyārī ||

128.4

गुरु पद प्रीति नीति रत जेई । द्विज-सेवक अधिकारी तेई ॥
ता कहँ यह बिसेष सुखदाई । जाहि प्रान प्रिय श्रीरघुराई ॥

guru pada prīti nīti rata jeī | dvija-sevaka adhikārī teī ||
tā kaham̐ yaha biseṣa sukhadāī | jāhi prāna priya śrīraghurāī ||

दो॰ 128दोहा

राम-चरन-रति जो चह, अथवा पद निर्बान ।
भाव सहित सो यह कथा, करउ श्रवन पुट पाल ॥

rāma-carana-rati jo caha, athavā pada nirbāna |
bhāva sahita so yaha kathā, karau śravana puṭa pāla ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0