उत्तरकाण्ड

अध्याय 118: माया और इन्द्रियाँ दीपक कैसे बुझाती हैं

10 श्लोक · 118 में से 130

इस अध्याय में क्या होता है

माया और इन्द्रियाँ दीपक कैसे बुझाती हैं

काकभुशुण्डि गरुड़ के सामने रूपक आगे बढ़ाते हैं। उस दीपक की लौ 'सोऽहमस्मि' की अखण्ड वृत्ति है। उसके प्रकाश में आत्मा का अनुभव होता है, अविद्या का अन्धकार मिटता है, और बुद्धि हृदय में बैठकर गाँठ खोलने लगती है। गाँठ खुल जाए तो जीव कृतार्थ हो। पर गाँठ खुलती देख माया अनेक विघ्न करती है: ऋद्धि-सिद्धियाँ भेजती है जो बुद्धि को लोभ दिखातीं और आँचल की हवा से दीपक बुझाती हैं। बुद्धि सयानी होकर उनकी ओर न देखे, तो इन्द्रियों के देवता उपद्रव करते हैं और इन्द्रियों के झरोखे विषयों की हवा के लिए खोल देते हैं। वह आँधी विज्ञान का दीपक बुझा देती है, गाँठ नहीं छूटती, और जीव फिर संसार में भटकता है। हरि की माया अत्यन्त दुस्तर है; यह विवेक कहने, समझने और साधने में कठिन है।

118.1

सोहमस्मि इति वृत्ति अखंडा । दीप सिखा सोइ परम प्रचंडा ॥
आतम अनुभव सुख सुप्रकासा । तब भव मूल भेद भ्रम नासा ॥

sohamasmi iti vṛtti akhaṃḍā | dīpa sikhā soi parama pracaṃḍā ||
ātama anubhava sukha suprakāsā | taba bhava mūla bheda bhrama nāsā ||

118.2

प्रबल अबिद्या कर परिवारा । मोह आदि तम मिटइ अपारा ॥
तब सोइ बुद्धि पाइ उँजिआरा । उर गृहँ बैठि ग्रंथि निरुआरा ॥

prabala abidyā kara parivārā | moha ādi tama miṭai apārā ||
taba soi buddhi pāi um̐jiārā | ura gṛham̐ baiṭhi graṃthi niruārā ||

118.3

छोरन ग्रन्थि पान जौँ सोई । तो यह जीव कृतारथ होई ॥
छोरत ग्रन्थि जानि खगराया । बिघ्न अनेक करइ तब माया ॥

chorana granthi pāna jaum̐ soī | to yaha jīva kṛtāratha hoī ||
chorata granthi jāni khagarāyā | bighna aneka karai taba māyā ||

118.4

रिद्धि सिद्धि प्रेरइ बहु भाई । बुद्धहि लोभ दिखावहिं आई ॥
कल बल छल करि जाहिँ समीपा । अञ्चल बात बुझावहिँ दीपा ॥

riddhi siddhi prerai bahu bhāī | buddhahi lobha dikhāvahiṃ āī ||
kala bala chala kari jāhim̐ samīpā | añcala bāta bujhāvahim̐ dīpā ||

118.5

होइ बुद्धि जौँ परम सयानी । तिन्ह तन चितव न अनहित जानी ॥
जौँ तेहि बिघ्न बुद्धि नहिँ बाधी । तो बहोरि सुर करहिँ उपाधी ॥

hoi buddhi jaum̐ parama sayānī | tinha tana citava na anahita jānī ||
jaum̐ tehi bighna buddhi nahim̐ bādhī | to bahori sura karahim̐ upādhī ||

118.6

इंद्रीं द्वार झरोखा नाना । तहँ तहँ सुर बैठे करि थाना ॥
आवत देखहिँ विषय बयारी । ते हठि देहिँ कपाट उघारी ॥

iṃdrīṃ dvāra jharokhā nānā | taham̐ taham̐ sura baiṭhe kari thānā ||
āvata dekhahim̐ viṣaya bayārī | te haṭhi dehim̐ kapāṭa ughārī ||

118.7

जब सो प्रभंजन उर गृहँ जाई । तबहिं दीप बिज्ञान बुझाई ॥
ग्रन्थि न छूटि मिटा सो प्रकासा । बुद्धि बिकल भइ बिषय बतासा ॥

jaba so prabhaṃjana ura gṛham̐ jāī | tabahiṃ dīpa bijñāna bujhāī ||
granthi na chūṭi miṭā so prakāsā | buddhi bikala bhai biṣaya batāsā ||

118.8

इन्द्रिन्ह सुरन्ह न ज्ञान सोहाई । बिषय भोग पर प्रीति सदाई ॥
विषय-समीर बुद्धि कृत भोरी । तेहि बिधि दीप को बार बहोरी ॥

indrinha suranha na jñāna sohāī | biṣaya bhoga para prīti sadāī ||
viṣaya-samīra buddhi kṛta bhorī | tehi bidhi dīpa ko bāra bahorī ||

दो॰ 118 (क)दोहा

तब फिरि जीव विविध बिधि, पावइ संसृति क्लेस ।
हरि माया अति दुस्तर, तरि न जाइ बिहगेस ॥

taba phiri jīva vividha bidhi, pāvai saṃsṛti klesa |
hari māyā ati dustara, tari na jāi bihagesa ||

दो॰ 118 (ख)दोहा

कहत कठिन समुझत कठिन, साधन कठिन बिबेक ।
होइ घुनाच्छर न्याय जौँ, पुनि प्रत्यूह अनेक ॥

kahata kaṭhina samujhata kaṭhina, sādhana kaṭhina bibeka |
hoi ghunācchara nyāya jaum̐, puni pratyūha aneka ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0