ग्यान पन्थ कृपान कै धारा । परत खगेस होइ नहिँ बारा ॥
जो निर्विघ्न पन्थ निर्बहई । सो कैवल्य परम पद लहई ॥
gyāna pantha kṛpāna kai dhārā | parata khagesa hoi nahim̐ bārā ||
jo nirvighna pantha nirbahaī | so kaivalya parama pada lahaī ||
7 श्लोक · 119 में से 130
काकभुशुण्डि गरुड़ के सामने तुलना पूरी करते हैं। ज्ञान का पथ तलवार की धार है; फिसलते देर नहीं लगती। जो उसे निर्विघ्न निभाए, वह कैवल्य पाता है, जिसे सन्त और वेद अत्यन्त दुर्लभ कहते हैं। पर राम को भजने वाले के पास वही मुक्ति बिना चाहे, बरबस आती है। जैसे जल धरती बिना नहीं रहता, वैसे मोक्ष-सुख हरिभक्ति को छोड़कर नहीं रहता। इसलिए सयाने हरिभक्त मुक्ति का निरादर कर भक्ति पर लुभाते हैं, और भक्ति बिना अलग प्रयास के अविद्या को नष्ट कर देती है, जैसे खाया भोजन जठराग्नि आप पचाती है। सेवक-सेव्य भाव बिना कोई नहीं तरता। जो जड़ को चेतन और चेतन को जड़ कर दें, उन रघुनायक को भजने वाले धन्य हैं।
ग्यान पन्थ कृपान कै धारा । परत खगेस होइ नहिँ बारा ॥
जो निर्विघ्न पन्थ निर्बहई । सो कैवल्य परम पद लहई ॥
gyāna pantha kṛpāna kai dhārā | parata khagesa hoi nahim̐ bārā ||
jo nirvighna pantha nirbahaī | so kaivalya parama pada lahaī ||
अति दुर्लभ कैवल्य परम पद । सन्त पुरान निगम आगम बद ॥
राम भजत सोइ मुकुति गोसाई । अनइच्छित आवइ बरिआई ॥
ati durlabha kaivalya parama pada | santa purāna nigama āgama bada ||
rāma bhajata soi mukuti gosāī | anaicchita āvai bariāī ||
जिमि थल बिनु जल रहि न सकाई । कोटि भाँति कोउ करइ उपाई ॥
तथा मोच्छ सुख सुनु खगराई । रहि न सकइ हरि भगति बिहाई ॥
jimi thala binu jala rahi na sakāī | koṭi bhām̐ti kou karai upāī ||
tathā moccha sukha sunu khagarāī | rahi na sakai hari bhagati bihāī ||
अस बिचारि हरि भगत सयाने । मुक्ति निरादर भगति लुभाने ॥
भगति करत बिनु जतन प्रयासा । संसृति मूल अबिद्या नासा ॥
asa bicāri hari bhagata sayāne | mukti nirādara bhagati lubhāne ||
bhagati karata binu jatana prayāsā | saṃsṛti mūla abidyā nāsā ||
भोजन करिय तृपिति हित लागी । जिमि सो असन पचवै जठरागी ॥
असि हरिभगति सुगम सुखदाई । को अस मूढ़ न जाहि सोहाई ॥
bhojana kariya tṛpiti hita lāgī | jimi so asana pacavai jaṭharāgī ||
asi haribhagati sugama sukhadāī | ko asa mūr̤ha na jāhi sohāī ||
सेवक सेव्य भाव बिनु, भव न तरिअ उरगारि ।
भजहु राम-पद पङ्कज, अस सिद्धान्त बिचारि ॥
sevaka sevya bhāva binu, bhava na taria uragāri |
bhajahu rāma-pada paṅkaja, asa siddhānta bicāri ||
जो चेतन कहँ जड़ करइ, जड़हि करइ चैतन्य ।
अस समर्थ रघुनायकहिं, भजहिँ जीव ते धन्य ॥
jo cetana kaham̐ jar̤a karai, jar̤ahi karai caitanya |
asa samartha raghunāyakahiṃ, bhajahim̐ jīva te dhanya ||
पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0