उत्तरकाण्ड

अध्याय 116: माया भक्ति से क्यों डरती है

6 श्लोक · 116 में से 130

इस अध्याय में क्या होता है

माया भक्ति से क्यों डरती है

काकभुशुण्डि गरुड़ से कहते हैं कि वे पक्षपात बिना वेद, पुराण और सन्तों का मत कह रहे हैं। नारी नारी के रूप पर मोहित नहीं होती। माया और भक्ति दोनों नारी-वर्ग की हैं; रघुवीर को भक्ति प्यारी है, माया केवल नर्तकी है। श्रीराम भक्ति के अनुकूल हैं, इसलिए माया उससे बहुत डरती है। जिसके हृदय में निरुपम राम-भक्ति अबाध बसती है, उसे देख माया सकुचा जाती है और अपनी प्रभुता नहीं चला पाती। इसीलिए विज्ञानी मुनि भी सब सुखों की खान भक्ति माँगते हैं। रघुनाथ का यह रहस्य कोई जल्दी नहीं जानता; जो उनकी कृपा से जाने, उसे स्वप्न में भी मोह नहीं होता। फिर वे ज्ञान और भक्ति का एक और भेद सुनाने को कहते हैं।

116.1

इहाँ न पच्छपात कछु राखउँ । बेद पुरान सन्त मत भाषउँ ॥
मोह न नारि नारि कें रूपा । पन्नगारि यह रीति अनूपा ॥

ihām̐ na pacchapāta kachu rākhaum̐ | beda purāna santa mata bhāṣaum̐ ||
moha na nāri nāri keṃ rūpā | pannagāri yaha rīti anūpā ||

116.2

माया भगति सुनहु तुम्ह दोऊ । नारि-बर्ग जानइ सब कोऊ ॥
पुनि रघुबीरहि भगति पियारी । माया खलु नर्तकी बिचारी ॥

māyā bhagati sunahu tumha doū | nāri-barga jānai saba koū ||
puni raghubīrahi bhagati piyārī | māyā khalu nartakī bicārī ||

116.3

भगतिहि सानुकूल रघुराया । ताते तेहि डरपति अति माया ॥
राम भगति निरुपम निरुपाधी । बसइ जासु उर सदा अबाधी ॥

bhagatihi sānukūla raghurāyā | tāte tehi ḍarapati ati māyā ||
rāma bhagati nirupama nirupādhī | basai jāsu ura sadā abādhī ||

116.4

तेहि बिलोकि माया सकुचाई । करि न सकइ कछु निज प्रभुताई ॥
अस बिचारि जे मुनि विज्ञानी । जाचहीं भगति सकल सुख खानी ॥

tehi biloki māyā sakucāī | kari na sakai kachu nija prabhutāī ||
asa bicāri je muni vijñānī | jācahīṃ bhagati sakala sukha khānī ||

दो॰ 116 (क)दोहा

यह रहस्य रघुनाथ कर, बेगि न जानइ कोइ ।
जो जानइ रघुपति कृपाँ, सपनेहुँ मोह न होइ ॥

yaha rahasya raghunātha kara, begi na jānai koi |
jo jānai raghupati kṛpām̐, sapanehum̐ moha na hoi ||

दो॰ 116 (ख)दोहा

औरउ ज्ञान भगति कर, भेद सुनहु सुप्रबीन ।
जो सुनि होइ राम-पद प्रीति सदा अबिछीन ॥

aurau jñāna bhagati kara, bheda sunahu suprabīna |
jo suni hoi rāma-pada prīti sadā abichīna ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0